डीयू छात्रसंघ चुनावों में इस बार लड़कों ने बाजी मारी

डूसू चुनाव की शुरुआत वर्ष 1954 से शुरू हुई थी। वर्ष 1973-74 तक डूसू चुनावों में चारों सीटों पर लड़कों का ही दबदबा कायम रहा। चाहे फिर वह उम्मीदवार किसी भी संगठन के रहे हों। इसके बाद से ही संगठनों ने चुनावों में ग्लैमर कार्ड खेलना शुरू किया। संगठनों को इसका फायदा भी मिलता रहा। कभी चार सीटों में एक सीट तो कभी दो तो कभी तीन सीटों पर लड़कियां कब्जा जमाती रहीं। वर्ष 1991-92 के बाद से तो डूसू की राजनीति में लड़कियां काफी हावी रहने लगीं। वर्ष 1993-94 में मोनिका कक्कड़ और शालू मलिक जीती।
वर्ष 1995-96 में अलका लांबा और रेखा जिंदल ने विजय पताका लहराई। वर्ष 1996-97 में एक बार फिर से दो सीटों पर छात्राओं ने जीत दर्ज की। उसके बाद के दो सालों में एक बार फिर एक-एक लड़की ही जीत हासिल कर पाई। वर्ष 2003-04 के बाद से तो डूसू की राजनीति में छात्राओं का दबदबा काफी कायम हो गया। इसका उदाहरण वर्ष 2009-10 में दखने को मिला जब चार में से तीन सीटों पर लड़कियों ने ही जीत हासिल की।












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