दिल्‍ली बम धमाका: शवों पर हुआ कमाई का खेल

Delhi Bomb Blast: Postmortem House charged double for pall and polythene
दिल्‍ली। अक्‍सर आपने लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि 'मस्‍तराम मस्‍ती में आग लगे बस्‍ती में' मगर आपके सामने ऐसा माज़रा शायद ही कभी आया हो। दिल्‍ली बम ब्‍लास्‍ट में मारे गये लोगों के परिजन जहां मातम मना रहे थे वहीं दूसरी तरफ एक तबका ऐसा था जिसे मानों तनख्‍वाह के साथ बोनस मिल गया हो। जी हां पोस्‍टमार्टम हाउस में कफन का करोबार करने वाले मातम की इस मजबूरी को भुना रहे थे। ये वो लोग थे जो लाशों पर रोटियां सेंक रहे थे। इन्‍हें ना तो किसी की संवेदनाओं से मतलब था और ना ही किसी की मौत उनके लिये मायने रखती है।

आपको यकीन नहीं होगा कि लेकिन यह रौंगटे खड़े कर देने वाला सच है। दिल्‍ली धमाकों की गूंज ने जहां उन लोगों के घर में अंधेरा कर दिया जिनके चिराग बुझ गये। लेकिन कहीं इन धमाकों की बजह से घरों में दिवालीयां मनी होंगी क्‍योंकि उनके घर वाले धमाके वाली रात दोगुने-तीगुने रकम कमा कर घर वापस लौंटे होंगे। जानते ह‍ैं कैसे, यहां हम उनकी बात कर रहे ह‍ैं जो पोस्‍टमार्टम हाउस के बाहर कफन की दुकान लगाये थे।

पोस्‍टमार्टम हाउस की बात करें तो बम विस्‍फोट में मरने वालों के कफन व पॉलीथीन की रकम वसूलते हुए कुछ लोग नजर आये। मौका देख कफन की रकम तो वसूली जा रही थी और वह भी दोगुनी। यह तो एक बात रही मगर खास बात यह है कि इन सबके बावजूद भी अस्‍पताल प्रशासन और सरकार इस घिनौनी हरकत पर मौन है। अस्‍पताल के शव गृह में यह कारोबार खुले ढंग से चल रहा था। जिन्हें यह मंजूर नहीं था वे बाहर से कपड़े और पॉलीथीन, रूई तथा अन्य सामग्री खरीद कर ला रहे थे। मजबूरी ऐसी थी कि अपनों को खोने वाले दौड़ दौड़ कर सामान जुटा रहे थे ताकि समय पर शव मिल जाए और अंतिम संस्कार किया जा सके।

बम विस्‍फोट में मरने वाले लोगों के परिजन और रिश्‍तेदार कह रहे थे कि हद हो गई है। किसी को हमारे दर्द से मतलब ही न‍हीं। अस्‍पताल परिसर में ऐसी व्‍यवस्‍था थी कि अगर जल्दी पोस्टमार्टम करने पर जोर दो तो कपड़ा और पॉलीथीन खरीद कर लाना पड़ता था। बात पैसों की नही मगर इंसानियत की जरुर है कि जो कफन और पॉलीथीन बाहर तीन सौ रुपये में मिल रहे थे उसके लिये अंदर नौ सौ रुपये चुकाने पड़ रहे थे।

ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि इतनी बड़ी घटना में एक तरफ जहां सरकार लाखों रुपये मुआवजे की बात कर रही है तो दूसरी तरफ शव को पैतृक घर तक ले जाने के लिए कोई सुविधा नहीं दी गई। ये एक कड़वा सच है जो हमने आपको बता दिया है, इस बारे में आपका क्या कहना है, क्या आपको लगता है कि ये सही हो रहा है? आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे लिखे कमेंट बॉक्स में दर्ज करायें। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।

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