कचरा बिनते-बिनते बना गया पर्यावरण विद
सिरसा। प्लास्टिक, पॉलीथीन बिनते देख समाज के लोगों की हंसी का पात्र बनने वाले पर्यावरण विद खम्भू राम बिश्रोई अब किसी पहचान के मोहताज नहीं है। प्लास्टिक, पॉलीथीन कचरा का बिनते-बिनते वे बन गए पर्यावरण विद।
जिले के उपमंडल मुख्यालय डबवाली की बिश्रोई धर्मशाला में आयोजित बिश्रोई धर्म के प्रर्वतक गुरू जंभेश्वर के जन्म दिवस पर समारोह में भाग लेने आये खम्भू राम बिश्रोई कामर्स में मास्टर डिग्री प्राप्त करने वाले राजस्थान उच्च न्यायालय जोधपुर में न्यायिक सहायक के पद पर कार्यरत है तथा जोधपुर में ही पर्यावरण व वन्य जीव संरक्षण संस्था चलाते है।
पॉलीथिन मुक्त राजस्थान बनाने का मिशन
एक भेंट में खम्भू राम बिश्रोई ने बताया कि वर्ष 2006 में बिश्रोई समाज की जन्मस्थली समरातल धोरा की यात्रा पर उन्होंने अनुभव किया कि बिश्रोई समाज के लोग रस्म अदा करते है, जिसमें मिट्टी को प्लास्टिक के लिफाफों में भरकर टीले पर ले जाते है और वहां से नीचे फैंकते है, जिस कारण भारी मात्रा में पालीथिन जमा हो जाता है। उन्होंने समाज के लोगों को पॉलीथीन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए दवाब बनाना शुरू किया, तो समाज के लोगों ने उसे टीले से धक्का दिया। खम्भूराम गिरे, मगर उत्साह नहीं गिरा और उसी ने बना दिया पर्यावरण विद।
लोगों को पॉलीथिन के प्रयोग न करने का आग्रह करते हुए पॉलीथिन बीनने हुए राजस्थान मुक्त पॉलीथिन का राग अलापने लगे। इसी बीच बिश्रोई समाज पर कवरेज करने के लिए पेरिस से एक फोटो जर्नलिस्ट फ्रेंक ओबल आये और उन्होने खम्भू के प्रयासों को अपने कैमरे में कैद किया।
दोस्तों के साथ मेले में चलाते हैं अभियान
खम्भू राम बिश्रोई बताते है कि प्रदेश भर में जहां भी मेला लगना होता है, वह अपने सात-आठ मित्रों को साथ लेकर दो दिन पहले ही वहां पहुंच जाते है और मेले में स्टॉल बुक करवाने वाले से पालीथिन न बेचने का शपथ लेते हैं और फिर कोई ऐसा करता है, तो उस पर जुर्माना ठोका जाता है। मेला परिसर में खम्भू राम की टीम गले में पॉलीथिन के खिलाफ संदेश लिखी तख्तियां डालकर घूमते हुए देश भक्ति के गीतों पर नाचते गाते है और भीड़ द्वारा गिराए गए पालीथिन एकत्रित करते है।
खम्भू राम बिश्रोई का एक सपना है कि पूरे देश को पालीथिन मुक्त बनाया जाए, परंतु राजस्थान प्रदेश को पालीथिन मुक्त बनाने का प्रण जरूर लिया है, जिसके चलते वह बिश्रोई समाज के धार्मिक स्थल समरातल धोरा, खेजडली, रामडावास, एक लखोरी, लोहावर, नेहडापाली में लगने वाले मेलों में वह अपने साथियों सहित के साथ जाकर पालीथिन बीनते है और लोगों को इससे बचने की सलाह देते है, मगर नौकरी के कारण समय की पाबंदी के कारण उनके प्रयासों में बाधा जरूर उत्पन्न करती है।
विदेशों में भी चला चुके हैं अभियान
फ्रांस की एक सुप्रसिद्ध पत्रिका ने अपने एक अंक में खम्भू राम बिश्रोई को दस पृष्ठ दिए और वर्ष 2008 में एशिया की तरह उन्हें पेरिस में आयोजित एक बैठक में बोलने का अवसर मिला। वर्ष 2010 में पेरिस से फोटो जर्नलिस्ट फ्रेंक बोगल, विनोवा तथा दिल्ली के साऊंड इंजिनियर सतीश कुमार जोधपुर गए और वहां पर उन्होने दो भागों में खम्भू राम बिश्रोई पर एक डक्यूमैंटरी बनाई,जो 11 जून 2011 को 'द बिश्रोई' के नाम पर फ्रेंच भाषा में पेरिस में रिलीज की गई, जो फ्रांस में चर्चित हो गई है।
इस डक्यूमैंटरी के आधार पर फ्रांस की एक एन जी ओ 'प्लानेट वर्कशाप' ने खम्भू राम को पेरिस में आमंत्रित किया है। यह एन जी ओ 26 से 28 सिंतबर 2011 तक 'पर्यावरण सरंक्षण के साथ विकास' विषय पर विश्वस्तरीय सेमिनार करने जा रहा है, जिसमें खम्भू राम बिश्रोई के साथ साथ विश्वस्तरीय पर्यावरण विद को संबोधित करेंगे।












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