बड़ा परिवर्तन ला सकता है राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्‍ट

नई दिल्‍ली। अन्‍ना हजारे ने अपना अनशन तोड़ने के बाद एक बड़े परिवर्तन की बात कही है। यह वो परिवर्तन होगा, जो देश के जनप्रतिनिधियों को सीधे तौर पर नियंत्रित कर सकता है और इसमें अन्‍ना के दो सुझाव- 'राइट टू रिकॉल' और 'राइट टू रिजेक्‍ट' कारगर साबित हो सकते हैं।

मेधांत सिटी अस्‍पताल में अन्‍ना को भर्ती करने के बाद डा. त्रेहान ने बताया कि अन्‍ना के शरीर में पानी की काफी कमी हो गई है। लिहाजा उनके स्‍वास्‍थ्‍य की निगरानी इंटेन्सिव केयर के अंतर्गत रखी जा रही है। डा. त्रेहान ने बताया कि अन्ना का ब्लड प्रेशर 120/70 तथा पल्स रेट 94 है। अन्ना को 72 घंटे तक तरल पदार्थ ही दिया जायेगा। उनकी लीवर और किडनी की जांच की जा रही है।

अन्‍ना को अस्‍पताल के जनरल वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। जल्‍द ही वो स्‍वस्‍थ्‍य हो जायेंगे। अन्‍ना के अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य की कामना करते हुए अगर हम उनके द्वारा सुझाये गये दो बिंदुओं पर चर्चा करें और उसे कैसे अमल में लाना है, इस पर सोचें तो अन्‍ना को बहुत खुशी होगी। पहला बिंदु है राइट टू रिकॉल यानी देश की जनता कभी भी किसी

भी मामले में अपने जनप्रतिनिधि को बुला सकती है। अन्‍ना का सुझाव है कि सभी सांसद किसी भी मुद्दे पर सदन में बयान देने से पहले अपने क्षेत्र की पंचायतों, ग्राम सभाओं, मोहल्‍ला सभाओं और वार्ड सभाओं से चर्चा करे और फिर सदन में बोले। इससे जनता की सीधी बात संसद तक पहुंच सकेगी।

अन्‍ना का दूसरा सुझाव राइट टू रिजेक्‍ट है। यह काफी महत्‍वपूर्ण इसलिए है, इसके अंतर्गत जनता के पास अपने कार्यों में नाकाम सांसद या विधायक को गद्दी से उतारने का अधिकार होगा। इसके अंतर्गत जब चाहे जनता अपने जनप्रतिनिधि से उनके कार्यों का हिसाब मांग सकेगी और जिस तरह मतों के आधार पर उन्‍हें चुना जाता है, उसी तरह मतों के आधार पर ही उनका चुनाव रद्द कर सकेगी।

अन्‍ना के यह दो सुझाव उन सांसदों और विधायकों को सबक सिखाने के लिए सबसे उत्‍तम साबित हो सकते हैं, जो चुने जाने के बाद नियमित रूप से सदन में नहीं जाते। जो सदन में जाते तो हैं, लेकिन एक भी प्रश्‍न नहीं पूछते या एक भी बयान नहीं देते। उन सांसदों-विधायकों को सबक सिखा सकती हैं, जो खुद को सुप्रीम समझते हैं और अपनी मनमानी करते रहते हैं। उन सांसदों-विधायकों को सबक सिखाने के लिए उत्‍तम हैं, जो बसपा के विधायक आनंद सेन (शशि हत्‍याकांड में लिप्‍त), पुरुषोत्‍तम द्विवेदी (बांदा रेप केस में लिप्‍त), शेखर तिवारी (इंजीनियर मनोज गुप्‍ता हत्‍याकांड), सांसद ए राजा (2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाला), दयानिधि मारन (2जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाला), लालू प्रसाद यादव (चारा घोटाला), बीएस येदियुरप्‍पा (अवैध खनन घोटाला), आदि की तरह देश पर काले धब्‍बे की तरह हैं।

अन्‍ना ने तीन दिन पहले रामलीला मैदान से एक और अहम बात कही थी वो है वसूली की। अब तक जितने भी घोटाले हुए, उनमें वसूली नहीं हुई। अन्‍ना का कहना है कि देश में ऐसा नियम लाना चाहिये, जिसके अंतर्गत घोटाला करने वाले अधिकारियों या नेताओं से उतने ही धन की वसूली की जा सके, जितने का उसने गबन किया है।

अन्‍ना के ये सुझाव वाकई में देश में बड़े बदलाव ला सकते हैं। लेकिन फिर वही सवाल खड़ा होता है- इन सभी को लागू करने के लिए क्‍या फिर से अन्‍ना या अन्‍ना जैसे किसी व्‍यक्ति को अनशन करना पड़ेगा? मेरा जवाब तो हां ही है, क्‍योंकि सरकार जब लोकपाल बिल पर इतने संघर्ष के बाद राजी हुई, तो इन पर कितना समय लगायेगी, यह आप बखूबी समझ सकते हैं।

सवाल आपसे- इन सुझावों को कैसे अमल में लाया जा सकता है? अपने जवाब नीचे कमेंट बॉक्‍स में खिलें।

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