अन्ना के अनशन ने लगाया गांधी टोपी को पंख

Delhi: Gandhi cap sales on the rise in contrary
नई दिल्ली। जनलोकपाल बिल की मांग पर चल रही सरकार और अन्ना टीम के बीच तकरार से भले ही किसी को फायदा हो या न हो पर गांधी टोपी बेचने वालों की जेबें जरूर भारी होती जा रही है। सार्वजनिक तौर पर हमेशा गांधी टोपी पहने दिखने वाले अन्ना ने इस टोपी को नए सिरे से परिभाषित करते हुए राजनीतिक सीमाओं के पार पहुंचा दिया है। अन्ना के प्रति लोगों की दीवानगी का आलम यह है कि देशभर के स्थानीय बाजारों में इन टोपियों की धूम मची हुई है।

आंदोलन में शामिल बच्चों से लेकर बुजुर्गो के सिर पर यह टोपियां देखी जा रही हैं। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और मध्य भारत के दुकानदारों के का कहना है कि गांधी टोपियां चुनावों और मराठी समुदाय में होने वाली शादियों के मौसम में रफ्तार पकड़ती है। मगर इस बार अन्ना के प्रभाव के चलते टोपियों की मांग खासी बढ़ गई है। इन दिनों अन्ना समर्थक खास तौर पर युवा वर्ग जमकर गांधी टोपी खरीद रहा है। वे उन गांधी टोपियों की मांग कर रहे हैं, जिन पर मैं हूं अन्ना और आई एम अन्ना जैसे नारे लिखे हों।

इन टोपियों की कीमत बाजार में पांच से दस रुपये के बीच है। राजनीतिक इतिहास के जानकारों के मुताबिक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर में गांधी टोपी एक तरह से कांग्रेस की ठेठ पहचान से जुड़ गई थी, लेकिन आजादी मिलने के बाद देश के प्रमुख सियासी दल के भीतर इसका चलन लगातार कम होता चला गया। देश की आजादी के 64 साल बाद गांधी टोपी फिर राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बन गई है।

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