फर्जी मुठभेड में उत्तर प्रदेश अव्वल

मृतकों के परिजनों का कहना है कि जिन्हें मारा गया वह अपराधी नहीं बल्कि आम लोगों की तरह से कार्य करने वाले लोग थे। राज्य में वर्ष 2010-2011 के दौरान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को उत्तर प्रदेश में मुठभेडों में सुरक्षा बलों के हाथों 40 व्यक्तियों के मारे जाने की शिकायत मिली। वर्ष 2008-09 और 2009-10 के दौरान कथित फर्जी मुठभेड में राज्य में 71 लोग मारे गए। प्रत्येक मुठभेड़ के बाद पुलिस ने गुडवर्क का ऐसा गुणगान किया जैसे उसने प्रदेश में अपराधियों का खत्मा कर दिया है। सूत्रों की माने तो देशभर में वर्ष 2008-09 की शुरआत से जून तक फर्जी मुठभेड़ों के 369 मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दर्ज किए और 90 मामलों में पुलिस की कार्रवाई संदेहपूर्ण पाई गयी।
आयोग ने मृतकों के परिजनों को 4.54 करोड़ रुपये की आॢथक सहायता देने की बात कही है। आयोग ने सभी मामलों की और अब तक 98 मामले हल किए जा चुके हैं जबकि शेष पर सुनवाई चल रही है। आयोग का कहना है कि अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि पुलिस फर्जी ढंग से मुठभेड़ को अंजाम देती है तो अपराधियों की बजाय मासूम को अपराधी बताकर उसको मुठभेड़ में मार दिया जाता है। प्रदेश के बाद पिछले तीन साल के दौरान फर्जी मुठभेडों के मामले में मणिपुर का दूसरे का स्थान रहा है। जहां 2008-09 में फर्जी मुठभेड में 16 तथा वर्ष 2009-10 में 32 तथा 2010-2011 में 12 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया है। आतंकवाद प्रभावित जम्मू कश्मीर में पिछले तीन साल के दौरान कथित फर्जी मुठभेड के 14 मामले दर्ज किए गए। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ में पिछले तीन साल में फर्जी मुठभेड के 11 मामले प्रकाश में आए। झारखंड और उडीसा मेंं ऐसे क्रमश: 13 व 12
मामले दर्ज किए गये। आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि देश में फर्जी मुठभेड़ बंद नहीं हो रही है और पुलिस मासूम जनता को डराने का काम कर रही है। पुलिस अपराधियों पर नकेल कस नहीं पाती है जबकि वह मासूम को लोगों को पकड़क कर पहले जेल में डालती है तथा बाद में मौका मिलते ही वह उनको मार कर मुठभेड़ का नाम दे देती है।












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