मुंबई पुलिस की व्यस्तता का फायदा उठाने में माहिर हैं आतंकी

शुरुआती दौर की बात करें तो 12 मार्च 1993 के बम धमाकों ने मुंबई को दहला कर रख दिया था। अब अगर पुलिस की व्यवस्तता पर नजर डालें तो उस समय मुंबई पुलिस कई दिनों तक चले दंगों को संभालने में जुटी थी। आपको बता दें कि वो दंगा अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाए जाने के बाद हुए थे और पूरा हिंदूस्तान इसकी आग में जल रहा था। उन दंगों के बाद मोहल्ले-मोहल्ले में कमेटियां बनाने में व्यस्त मुंबई पुलिस समाज के अंदर की हलचल को समझ नहीं सकी और अंडरवर्ल्ड ने धमाके के रूप में अपनी करामात पेश कर दी।
1993 में हुए मुंबई धमाके की पूरी योजना मुंबई में ही बनी थी और इसे अंजाम देने वाले भी मुंबई के ही लोग थे। इस हादसे के बाद मुंबई को 25 अगस्त 2003 में फिर निशाना बनाया गया। इस बार दहशतगर्दों ने झावेरी बाजार और गेट वे ऑफ इंडिया को निशाना बनाया। इस बार भी मुंबई पुलिस नासिक के कुंभ मेले में व्यस्त नजर आई। न सिर्फ मुंबई, बल्कि पूरे राज्य की पुलिस कुंभ के शाही स्नानों की सुरक्षा में लगी थी।
पुलिस ने जब अपना पूरा ध्यान मुंबई पर केंद्रित कर दिया तो मुंबई शांत हो गई। दहशतगर्द अपने अपने बिल में छुप गये। मगर तीन साल बाद उन्हें उस समय (11 जुलाई 2006) फिर मौका मिला जब महाराष्ट्र पुलिस यहां भड़के आंदोलन से निपटने में व्यस्त हो गई। इस बार आतंकी संगठनों ने मुंबई की लोकल ट्रेनों को निशाना बनाया और सिलसिलेवार बम विस्फोट किये।
मालूम हो कि उस समय महाराष्ट्र पुलिस मुंबई के शिवाजी पार्क क्षेत्र में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की दिवंगत पत्नी मीना ताई ठाकरे की प्रतिमा के अपमान के बाद पूरी मुंबई आंदोलनों के दौर से गुजर रही थी और इसी दौरान ठाणे के भिवंडी कस्बे में समाजवादी पार्टी द्वारा एक कब्रिस्तान को लेकर बड़ा आंदोलन भड़क उठा था।
अभी पुलिस राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उपद्रवों से जूझ रही थी सितम्बर 2008 में मालेगांव में धमाका हो गया। बताते चलें कि इस विस्फोट में पहली बार हिंदू आतंकवादी की भूमिका सामने आई और मुंबई पुलिस का पूरा आतंकवाद निरोधक दस्ता साध्वी प्रज्ञा एवं कर्नल पुरोहित की छानबीन में लगा गया। बस क्या था पुलिस इधर व्यस्थ हुई उधर आतंकियों ने अपना काम कर दिया। 26 नवम्बर 2008 (26/11) को मुंबई पर पाकिस्तानी आतंकियों ने मुंबई ताज हमला, ओबेरॉय होटल और नरीमन व्वाइंट पर हमला बोल दिया।
और अब 13 जुलाई, 2011 के धमाकों की बात करें तो इस हमले से ठीक एक माह पूर्व से ही मुंबई पुलिस पूरी तरह से मिड डे अखबार के खोजी एवं वरिष्ठ पत्रकार जे डे की हत्या का मामला सुलझाने में लगी रही। सरकार और पुलिस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए इस हत्याकांड के लिए एक दर्जन से ज्यादा टीमों का गठन किया गया था और वे सभी टीमें उसी में व्यस्त थीं। इसी का फायदा उठाते हुए आतंकियों ने इन धमाकों को अंजाम दे डाला और 21 बेगुनाहों की जान ले ली।












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