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चिदंबरम साहब पहले अपनी लोकल इंटेलीजेंस को मजबूत करिये

मुंबई में बुधवार की शाम हुए सीरियल ब्‍लास्‍ट के बाद रात के करीब दो बजे गृहमंत्री पी चिदंबरम मुंबई पहुंचे। रात भर मुआयना करने और जांच एजेंसियों से वार्ता के बाद गुरुवार की दोपहर उन्‍होंने प्रेस वार्ता की और कहा कि ये धमाके खुफिया तंत्र की नाकामी नहीं है। चिदंबरम ने बड़ी ही आसानी से कह दिया कि घनी आबादी वाले शहरों में आतंकी वारदातों को रोकना काफी कठिन होता है।

चिदंबरम साहब के इस बयान को जनता भले ही स्‍वीकार कर ले, लेकिन मीडिया जगत कतई स्‍वीकार नहीं करेगा, क्‍योंकि आधे से ज्‍यादा मीडियाकर्मी खुफिया विभाग की असलियत से वाकिफ हैं।

खुफिया विभाग तभी मजबूत हो सकता है, जब उसके जमीनी स्‍तर पर काम करने वाले लोग सक्रियता से काम करें। देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी रॉ भले ही कितनी ही सक्रिय क्‍यों ना हो जाये, जब तक लोकल इटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू) यानी स्‍थानीय स्‍तर पर काम करने वाले खुफिया कर्मचारी सक्रिय नहीं होंगे, तबतक ऐसे हमले रोज होते रहेंगे। जी हां देश के लगभग सभी शहरों की एलआईयू पासपोर्ट वैरिफिकेशन करवाने वाली यूनिट मात्र बनकर रह गई है। उसमें भी जमकर रिश्‍वत चलती है।

यदि आपको अपने पासपोर्ट का वैरिफिकेशन करवाना हो, आप एलआईयू के कॉन्‍सटेबल के हाथ में 500 रुपए रख दीजिये। आपका वैरिफिकेशन पक्‍का। अगर 1000 रख दिये तब तो पूछने की कोई बात ही नहीं। सच पूछिए तो 500 रुपए के वैरिफिकेशन पर बनने वाले फर्जी पासपोर्ट लेकर ही आतंकवादी पड़ोसी देशों से भारत में दाखिल होते हैं।

पासपोर्ट वैरिफिकेशन के बाद बात करें तो एलआईयू के अधिकारियों व उनके नीचे काम करने वाले कांस्‍टेबलों का काम होता है खुफिया विभाग को जमीनी स्‍तर की जानकारियां पहुंचाना। इसके लिए वे सादे कपड़ों में पान व चाय की दुकानों पर खड़े होकर दिन बिताते हैं। जहां भीड़ इकठ्ठा होती है वहां आम आदमी की तरह रहते हैं और अपने मुखबिरों से सूचना प्राप्‍त कर विभाग को अपडेट करते रहते हैं। मगर अफसोस आधे से ज्‍यादा शहरों में ऐसा नहीं होता।

मुंबई से लेकर दिल्‍ली तक, लखनऊ से लेकर वाराणसी तक यानी हर छोटे-बड़े शहरों में अधिकांश एलआईयू कांस्‍टेबल व एसओ स्‍तर के अधिकारी सूचना पाने के लिए क्राइम रिपोर्टरों पर निर्भर रहते हैं।

एलआईयू के अधिकांश कम्रचारी सुबह उठकर सबसे पहला फोन बड़े अखबार के पत्रकारों को लगाते हैं और जो भी जानकारी होती है उसी के आधार पर अपने विभाग को अपडेट कर देते हैं। यही कारण है कि एलआईयू अधिकारियों लिए उनके सबसे अच्‍छे दोस्‍त उनके शहर के पत्रकार ही होते हैं।

अब बात अगर ऊपरी तबके की करें तो गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक समय-समय पर खुफिया एजेंसियां राज्‍यों के गृह विभागों को सूचनायें भेजती रहती हैं। ऐसे में गृह विभाग के अधिकारियों व पुलिस की जिम्‍मेदारी होती है कि वो खुफिया विभाग से प्राप्‍त जानकारी की पुष्टि करे और उसकी छानबीन करे। लेकिन अफसोस ऐसा भी नहीं होता। तमाम सूचनाएं मात्र कंप्‍यूटर के डाटाबेस में दफ्न हो जाती हैं और पुलिस उन पर ध्‍यान तक नहीं देती।

इन बातों के साथ हम जनता की ओर से गृहमंत्री से सिर्फ यही कहना चाहेंगे- चिदंबरम साहब पहले अपने लोकल इंटेलिजेंस को मजबूत करिये।

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