तीन डीएमके सांसदों के बाद मुरली देवड़ा पर 2जी स्पेक्ट्रम का साया

मालूम हो कि लूप टेलीकॉम में एस्सार की हिस्सेदारी पर सवाल उठाते हुए कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय ने डीओटी यानि डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम को 2009 में लूप का लाइसेंस रद्द करने को कहा था। दो साल बाद अचानक कंपनी मामलों का वही मंत्रालय लाइसेंस रद्द करने के बजाए लूप में एस्सार की हिस्सेदारी को तय दायरे में बता रहा है। सूत्रों के मुताबिक लूप टेलीकॉम को लाइसेंस देने में टेलीकॉम नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं।
आरोप है कि लूप टेलीकॉम में एस्सार की दस फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। ऐसे में डॉट यानि डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम के नियम के मुताबिक लूप टेलीकॉम को लाइसेंस नहीं मिलना चाहिए था। लेकिन बावजूद इसके लूप टेलीकॉम को लाइसेंस दे दिया गया। साल 2009 में इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए कंपनी मामलों के मंत्रालय ने डीओटी को चिठ्ठी लिखकर लूप का लाइसेंस रद्द करने को कहा था। अब यही मंत्रालय मई, 2011 में एस्सार की हिस्सेदारी को तय दायरे के अंदर बता रहा है।
ऐसे में कॉरपोरेट अफेयर मिनिस्ट्री के रवैये पर सवाल उठना लाजिमी है। इसका खामियाजा मुरली देवड़ा को अपना मंत्रालय गंवाकर उठाना पड़े तो इसमें भी कोई ताज्जुब की बात नहीं। ये पहला मौका है जब टेलीकॉम घोटाले में सीधे तौर पर किसी कांग्रेसी मंत्री का नाम सामने आ रहा है। सवाल ये उठता है कि आखिर कॉरपोरेट अफेयर मंत्रालय किस दबाव में एस्सार की हिस्सेदारी सही ठहरा रहा है। सीबीआई की जांच का एक अहम बिंदु ये भी है। यही वजह है कि सीबीआई जल्द ही कंपनी मामलों के मंत्रालय के आला अधिकारियों से पूछताछ करने जा रही है।
अब तो देखना यह कि पूर्व में ही ए राजा, कनिमोझी और दयानिधि मारन को अपनी चपेट में ले चुका टेलीकॉम घोटाला मुरली देवड़ा पर कितना असर डालता है। जानकारों की मानें तो मंत्री मुरली देवड़ा की भी कुर्सी इस मामले में सांदिग्ध मानी जा रही है। अब ऐसे में देवड़ा पर अगर सीबीआई को थोड़ी सा भी संदेह हुआ तो उनकी कुर्सी को कोई बचा नहीं सकता।












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