हमारा बोझ कौन उठाएगा?

चारबाग रेलवे स्टेशन पर कार्य कर रहे कई कुलियों ने तो अपने पढ़े लिखे लड़कों को अपना बिल्ला देकर काम पर लगा दिया लेकिन वे लोग क्या करें जिनके बेटा ही नहीं। ऐसे लोग अब कुली का कार्य ही छोड़ रहे हैं। चारबाग रेवले स्टेशन व जक्शन पर कुल मिलाकर साढ़े तीन सौ के करीब कुली हैं। जो स्टेशन से गुजरने वाली 250 गाडिय़ों पर चढऩे व उतरने वाले डेढ़ लाख यात्रियों के सामान उठाते हैं।
हालात तो यह हैं कि कई बार यात्रियों को कुली नहीं मिलते और उन्हें स्वयं ही सामान उठाकर चलना पड़ता है। समय जिस तेजी से बदल रहा है उससे यह कहा जा सकता है कि आने वाली पीढिय़ा रेलवे स्टेशन पर लालवर्दी धारी कुलियों को देख नहीं पाएंगे। बीते कुछ वर्षों में रेलवे ने जमकर तरक्की की खूब मुनाफा कमाया लेकिन ऐसे कोई भी योजना तैयार नहीं की जिससे कुलियों की स्थिति कुछ बदल जाती।
वजन उठाने वाले कुली बताते हैं कि एक किलोग्राम से 35 किलोग्राम तक वजन उठाने पर 16 रुपये मिलते हैं। अब सवाल यह है कि 16 रुपये कमाने वाला शक्स दिन भर कड़ी मशक्कत के बाद जो धन अर्जित करे वह अपना व परिवार का भरण पोषण किस प्रकार कर पाता होगा। कुलियों का कहना है कि ढाई वर्ष पूर्व लखनऊ की छोटी व बड़ी लाइन को मिलाकर उनकी संख्या 550 थी लेकिन आज यह घटकर 345 रह गयी है जिसमें से 235 बड़ी लाइन पर तथा 110 छोटी लाइन पर बचे हैं। चारबार की यह तस्वीर यदि थोड़ी से तिरछी कर देखी जाए तो बादशाह नगर व सिटी स्टेशन पर मात्र 3-3 कुली ही बचे हैं। तीन कुली इन स्टेशनों पर उतरने वाले यात्रियों की क्या मदद कर पाते होगी।
यहां तो फिर भी कुली दिख जाते हैं राजधानी के कुछ स्टेशन ऐसे भी हैं जहां कुली नजर ही नहीं आते उसमें मानक नगर, ऐशबाग, गोमती नगर व आलमबाग रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को स्वयं सेवा ही करनी पड़ती है क्योंकि वहां एक भी कुली नहीं है। अधेड़ उम्र के कई कुली ऐसे भी हैं जिन्होंने वजन उठाने का कार्य छोड़कर स्टेशन के बाहर दुकानें सजा ली हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि वक्त के साथ बढ़ी जरूरतों ने लोगों उनकी कुलीगिरी से दूर कर दिया। रेलवे प्रशासन भी इन कुलियों की बेहतरी के बारे में कुछ नहीं सोच रहा है।
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