गडकरी के फोन के बाद आखिर मान गए मुंडे

प्राप्त जानकारी के अनुसार, भाजपा को मुंडे संकट से मुक्ति मिल गई है। बुधवार को तेजी से चले घटनाक्रम में शाम होने तक मामला बगावत से हटकर साथ चलने तक पहुंच गया। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज व गोपीनाथ मुंडे की मुलाकात के बाद जब दोनों नेता साथ बाहर आए तभी साफ हो गया कि मुंडे अब भाजपा में ही रहेंगे। खुद मुंडे ने घोषणा की कि वे वह भाजपा में हैं और भाजपा में ही रहेंगे। मुंडे ने कहा कि उन्होंने मन की पीड़ा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने रखी है और समाधान करना उनका काम है। इस बारे में बातचीत जारी है।
वहीं इस घोषणा के बाद नितिन गडकरी ने मुंडे से फोन पर बात की और कहा कि वे साथ बैठकर विवाद को सुलझा लेंगे। सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने मुंडे को आश्वस्त किया है कि महाराष्ट्र में उनका सम्मान बरकरार रखा जाएगा और संगठन के फैसलों में पूरी तवज्जो दी जाएगी। मुंडे को भी आगे से बगावती तेवर न दोहराने को कहा गया है। दरअसल यह लड़ाई भी मुद्दों के बजाए इन दोनों नेताओं के अहम की ज्यादा थी। हालांकि मुंडे ने पार्टी पर दबाव बनाने के लिए पिछड़ा कार्ड भी खेला था और पार्टी के कुछ प्रमुख पिछड़ा वर्ग नेताओं ने उनका समर्थन भी किया था।
वहीं सियासी हलकों में चर्चा है कि मुंडे किसी भी कीमत पर पार्टी में वापस नहीं लौटना चाहते थे पर कांग्रेस द्वारा कुछ मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाने के कारण वे वापस अपनी पार्टी में ही लौट आए। कांग्रेस के साथ उनके दो मुद्दों पर मतभेद थे। एक तो वे कैबिनेट स्तर के मंत्री पद मांग रहे थे तो दूसरे अपने निजी हितों की वह पूरी तरह सुरक्षा चाह रहे थे। सूत्र बता रहे हैं कि गोपीनाथ मुंडे की अपनी दो चीनी मिलें हैं साथ ही कुछ अन्य मिलों को लेकर किराए पर भी चलाते भी हैं। चूंकि चीनी मिलों को चलाने के लिए सरकार की हर जगह जरूरत पड़ती है इसलिए वह चाह रहे थे कि कांग्रेस में वे किसी भी प्रकार से इंट्री कर लें जिससे उनके निजी हित सधते रहें। पर पवार ने उनकी एक न चलने दी और वे पुनः पार्टी में वापस हो गए।












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