क्या असहमतियों के बीच सफल होगी लोकपाल बिल की अंतिम बैठक?

चलिये शुरुआत करते हैं अभी तक की ताज़ा खबरों से। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकपाल बिल पर सर्वदलीय बैठक बुलाने से पहले यूपीए की एक बैठक बुलाने का फैसला किया है। वहीं प्रणब मुखर्जी कमेटी सदस्यों से बातचीत में व्यस्त हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि कैबिनेट को सिर्फ एक लोकपाल बिल भेजा जायेगा। सरकार और ड्राफ्टिंग कमेटी के बीच तनातनी के प्रमुख कारणों की बात करें तो सबसे पहला कारण निर्णयात्मक पक्ष है।
सिविल सोसाइटी चाहती है कि प्रधानमंत्री और न्यायपालिका प्रमुख को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाये। सरकार प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाने पर सहमत है, लेकिन न्यायपालिका पर नहीं। अन्ना हजारे की टीम चाहती है लोकपाल के पास किसी भी मंत्री को हटाने का अधिकार हो, जबकि सरकार चाहती है कि लोकपाल के पास मंत्रियों को कठघरे में खड़ा करने तक का अधिकार हो।
सिविल सोसाइटी चाहती है कि सीबीआई, सतर्कता विभाग और सीवीसी को लोकपाल के साथ संबद्ध कर दिया जाये, जबकि सरकार इसके विरोध में है। सीएजी और सीईसी का चयन लोकपाल द्वारा किये जाने व सभी प्रशासनिक अधिकारियों को लोकपाल के दायरे में लाने के प्रस्ताव पर भी सरकार राजी नहीं है।
टीम अन्ना चाहती है कि अभियोग चलाने व फोन टैप करने का अधिकार लोकपाल के पास होना चाहिये। सरकार अभियोग चलाने के अधिकार से पूरी तरह असहमत है, जबकि फोन टैपिंग के लिए सरकार का कहना है कि लोकपाल को गृह सचिव से इसकी अनुमति लेनी होगी। सिविल सोसाइटी भ्रष्टाचार के मामले में अधिकतम सजा उम्रकैद होनी चाहिये, जबकि सरकार इसे 10 साल तक सीमित रखना चाहती है।
ऐसे कई विरोधाभास हैं, जिसके कारण लोकपाल बिल पर सहमति नहीं बन पा रही है। मंगलवार को होने वाली बैठक में यह बिंदु प्रमुख तौर पर उठाये जाएंगे, जिन पर दोनों पक्षों की सहमति बनना काफी मुश्किल दिख रहा है। हालांकि अन्ना हजारे की अनशन की धमकी को देखते हुए सरकार इन बिंदुओं में से बीच का रास्ता जरूर खोजने के प्रयास करेगी। यही नहीं यूपीए लोकसभा के मॉनसून सत्र को भी बर्बाद नहीं होते देखना चाहती।












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