पटना: दो साल से अपनी ही कैद में थी दो जिंदगियां

सालो से एक कमरे में बंद ये भाई बहन बंद दरवाजे से बाहर नहीं आना चाहते थे। उन्हें बाहरी दुनिया से डर लगता था। दोनों महज हड्डी का ढांचा भर रह गये हैं। उनकी हालत का अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने खुद को घर में कपड़े से बांध रखा था। सोमवार को पटना के शिवपुरी इलाके में बाबू और सुजाता को जब इनके घर से बाहर निकाला गया तो देखने वालों के रोंगटे खड़े हो गए। जब पिछले कई महीने से भाई बहन घर से नहीं निकले तो आस पड़ोस के लोगों ने दरवाजा खुलवाना चाहा लेकिन कभी भी इन्होंने दरवाजा नहीं खोला। ना किसी से कोई बात की। पड़ोसियों ने पुलिस को भी खबर दी और एक स्थानीय एनजीओ की मदद से इन्हें बाहर निकाला।
हालात ने बना दी ऐसी हालत
ऐसा नहीं कि बाबू और सुजाता शुरू से ऐसे थे। दरअसल हालात ने इन्हें तोड़ दिया। पहले डिप्टी कलेक्टर पिता ब्रजकिशोर सिंह 1980 में घर से क्या निकले कभी वापस ही नहीं आए। पिता के जाने के बाद मां गोदावरी देवी को कार्मिक विभाग में नौकरी मिली। लेकिन पति के जाने का सदमा उनके मन में घर कर चुका था वो शिज़ोफ्रेनिया की मरीज हो गईं और दो साल पहले वो भी गायब हो गईं। बहन नीता भी मां-बाप की तरह गुम हो गई। सदमे में भाई रोहन उर्फ डिक्की चल बसा। इसके बाद बाबू और सुजाता ऐसे सहम गए कि डिक्की का शव चार दिनों तक घर में पड़ा रहा। आखिर पड़ोसियों और कुछ जानकारों ने शव का अंतिम संस्कार किया।
डिक्की की मौत के बाद तो सुजाता और बाबू खौफ में आ गए और उन्हें बाहरी दुनिया से डर लगने लगा। उन्होंने खुद को कमरे में कैद कर लिया। दोनों भाई बहनों को इलाज के लिये अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां उनकी हालत नाजुक बताई जा रही है। आपकों यह जानकर हैरत होगी कि सुजाता ने पटना के एक दैनिक अखबार में काफी वक्त तक उप संपादक की नौकरी भी की थी। उसने कई खोजी रिपोर्ट भी की। पर घर की हालत और एक के बाद एक हादसों ने उसे भी तोड़ दिया और वो भी शिज़ोफ्रेनिया की मरीज हो गई।












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