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राजनीतिक सफर की हर हार को जीत में बदला जयललिता ने

Jaya Lalitha
बेंगलुरू। तमिलनाडु में डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि को राजनीतिक शतरंज में मात देने वाली जे जयललिता भारी बहुमत के साथ तमिलनाडु की सत्‍ता पर विराजमान होने जा रही हैं। वो चौथी बार राज्‍य की मुख्‍यमंत्री बनेंगी। इसमें कोई शक नहीं है कि सीएम की कुर्सी को एक बार फिर हांसिल करने के लिए जयललिता ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उन्‍होंने तमिल जनता का दिल जीतने के लिए क्‍या नहीं किया। जयललिता की जीत के पीछे डीएमके का भ्रष्‍टाचार ही नहीं बल्कि जया का संघर्ष भी बड़ा कारण है।

जयललिता के संघर्ष की बात करें तो जीवन के हर पड़ाव में उन्‍हें संघर्ष करना पड़ा। राजनीति में आने से पहले जयललिता फिल्‍म अभिनेत्री थीं। अपने फिल्‍मी करियर में ही उन्‍होंने लाखों लोगों के दिलों पर राज करना शुरू कर दिया था, कि तभी एआईएडीएमके के संस्‍थापक व प्रभावी राजनेता मरु‍थुर गोपालन रामाचंद्रन (एमजीआर) ने जयाललिता को राजनीति में लॉन्‍च किया।

कर्नाटक के मेलुकोटे में जन्‍मी जयललिता का आधे से ज्‍यादा जीवन तमिलनाडु में ही बीता। वे 1981 में एआईएडीएमके में शामिल हुईं और 1988 में बतौर राज्‍यसभा सदस्‍य संसद में कदम रखा। एमजीआर के निधन के बाद जयललिता के पास दो विकल्‍प थे, पहला एमजीआर की पत्‍नी के साथ राजनीति में आगे बढ़ने का और दूसरा अकेले। उन्‍होंने अपनी राह अकेले ही चुनी और आगे बढ़ गईं। तब तक वो लोगों के बीच ख्‍याति प्राप्‍त कर चुकी थीं।

1989 में जयललिता पहली बार विधानसभा चुनाव जीतीं और राज्‍य की पहली विपक्षी नेता बनीं। आगे चलकर उन्‍होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। 1991 के चुनाव के ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्‍या की वजह से उनके गठबंधन को सिम्‍पेथी वोट मिले और वो भारी बहुमत के साथ सत्‍ता में आयीं। तब वो तमिलनाडु की पहली महिला मुख्‍यमंत्री बनीं।

पांच साल के कार्यकाल में जयललिता कई विवादों में फंसीं, जिसकी वजह से 1996 के चुनाव में उनहें हार का सामना करना पड़ा। उनके आधे से ज्‍यादा प्रत्‍याशी हारे। यह हार 2001 में एक बार फिर जयललिता सत्‍ता में वापस आयीं, वो भी भारी बहुमत के साथ। लेकिन एक बार फिर वो राजनीतिक इम्‍तहान में खरी नहीं उतर सकीं और 2006 के चुनाव में उनके सबसे बड़े प्रतिद्वन्‍द्वी डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि विधानसभा चुनाव में जीते।

इस करारी हार के बावजूद जयललिता ने संघर्ष जारी रखा और अब 2011 के चुनाव में एक बार फिर सत्‍ता में लौटी हैं। लेकिन एक बार तय है, जया को हमेशा ध्‍यान में रखना होगा कि करुणानिधि की हार का सबसे बड़ा कारण घोटाला रहा है। इससे यह साफ है कि तमिलनाडु की जनता भ्रष्‍ट लोगों को सत्‍ता में ज्‍यादा दिन तक नहीं देख सकती, लिहाजा जय‍ललिता से अगर लोगों ने उम्‍मीदें बांधी हैं, तो उन्‍हें खरा उतरना ही होगा, नहीं तो पांच साल बाद तराजू फिर से विपक्ष की तरफ झुक जाएगा।

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