क्या नरेंद्र मोदी सही में गुजरात दंगों के दोषी हैं?

आगे बात करने से पहले मैं अपनी आंखों देखी आपके साथ शेयर करना चाहूंगा। 24 सितंबर 2010 में अयोध्या मामले पर फैसला आने वाला था। उसी दिन मैं बेंगलुरू से लखनऊ पहुंच रहा था। मेरे बगल के कंपार्टमेंट में एक मुस्लिम फैमिली बैठी थी। ट्रेन जब इलाहाबाद पहुंची तो वहां चार पुलिस वाले रिजर्वेशन वाले डिब्बे पर चढ़े। वे सभी माथे पर तिलक लगाये हुए थे, यानी सभी कट्टर हिन्दू थे। चारों पुलिसकर्मी मेरे कंपार्टमेंट में आकर बैठ गये।
जाहिर है उस दिन सिर्फ अयोध्या फैसला ही चर्चा का विषय था। चारों पुलिस वाले आपस में उसी मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे। चारों ने अपना मत रखा कि फैसला हिन्दुओं के पक्ष में ही जाना चाहिए। मैंने पूछा अगर मुसलमानों के हक में फैसला गया तो क्या होगा? एक पुलिसकर्मी बोला- पूरे देश में दंगे भड़क जाएंगे... मैने पूछा अगर फैसला हिन्दुओं के हम में हुआ तो? जवाब मिला तब भी दंगे भड़केंगे.... तब मैने पूछा दंगे भड़के तो आप क्या करेंगे? इस पर जो जवाब मिला वो हैरान कर देने वाला था। चारों पुलिसकर्मी बोले... हम तो दंगा करने वाले मुसलमानों को लाठियों से कूच डालेंगे...
ये मुसलमान पता नहीं अपने आपको क्या समझते हैं... अयोध्या में सिर्फ मंदिर ही बनना चाहिए... उसी दौरान मेरी नज़र मुस्लिम फैमिली के एक सदस्य पर पड़ी। उसकी आंखों में पानी था। वो घबराया हुआ सा था। घरबाने वाली बात भी है, क्योंकि जिन पुलिस वालों को हमने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी दी है वही ऐसी बात कर रहे हैं।
यह तो एक उदाहरण मात्र है। इस वाक्ये को अगर गुजरात दंगों से जोड़ें, तो यह साफ हो जाता है, कि वहां भी हिन्दु पुलिसकर्मियों ने मुसलमानों पर लाठियां भांजने में कोई कसर नहीं छोड़ी होगी। बात अगर नरेंद्र मोदी की करें, तो अगर उन्होंने पुलिस अधिकारियों को मुस्लिमों के खिलाफ भड़ास निकालने के निर्देश दे भी दिये थे, तो क्या अधिकारियों का खुद का ईमान नहीं था। क्या खुद संजीव भट्ट या उनके जैसे अन्य अधिकारियों के अंदर इंसानियत नहीं थी। क्या वे अपने विवेक से काम नहीं ले सकते थे।
संजीव भट्ट का कहना है कि गोधरा कांड के बाद मोदी ने कहा था- यह समय की मांग है कि मुसलमानों को सबक सिखाया जाए, ताकि इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों। मोदी ने जो कहा सो कहा, क्या तमाम डिग्रियां पाने के बाद आईएएस/आईपीएस बने अधिकारियों का खुद का ईमान नहीं था। अगर नहीं था, तो मेरी नज़र में संजीव भट्ट को आईपीएस बनने का अधिकार नहीं। वे उन्हीं कॉन्सटेबलों के बराबर हैं, जो मुझे ट्रेन में मिले थे।
अब अगर आईएएस/पीसीएस यह कहें कि उन्हें मुख्यमंत्री का निर्देश था, इसीलिए उन्होंने हिन्दुओं को मुसलामानों को काटने से नहीं रोका, तो यह हमारे देश का दुर्भाग्य है। जी हां ऐसा सिर्फ गुजरात में नहीं बल्कि पूरे देश में होता आ रहा है। यहां रात-दिन एक करके पढ़ाई करने के बाद आईएएस/पीसीएस मंत्रियों की कठपुतली बनकर रह जाते हैं। जब तक ऐसा चलता रहा, तब तक गोधरा जैसे कांड होते रहेंगे।












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