पंजाब में पुरूषों की जेल में रह रहीं महिला कैदी

यह रहस्य भारतीय प्रशासनिक अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह ने पी एच डी डिग्री के विषय ''कैदियों के मानवाधिकार (केंद्रीय जेल अमृतसर) के अध्ययन दौरान उजागर किया है। आई पी एस से डाक्टर बने कुंवर विजय प्रताप सिंह ने गुरू नानक देव युनिवर्सिटी से डिग्री प्राप्त की है। इस अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि पंजाब प्रदेश में महिला कैदियों के लिए जेलों की जरूरत है, जिसका निर्देश पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट 2006 में दे चुकी है। राज्य में पुरूष जेली मं बंद महिला कैदी स्वयं को असुरक्षित समझती है, तथा उन्हें बराबर का भय बना रहता है कि कोई उनकी इज्जत पर आक्रमण न कर दे। महिला कैदियों की स्वासथय सेवाएं, बच्चों को जन्म देने तथा पारिवारिक सदस्यों से मुलाकात इत्यादि के महिला जेल जरूरी है, जबकि स्वास्थय संबंधी जरूरत पडऩे पर सरकारी अस्पतालों के टाईम डाक्टरों का प्रबंध किया जाता है। महिला कैदियों को उनकी जरूरत का सामान भी नहीं दिया जाता।
अमृतसर की केंद्रीय जेल में 2500 कैदियों पर सिर्फ दो ही डाक्टर है, जबकि महिलाओं की, जिनकी संख्या करीब एक सौ है, के लिए महिला डाक्टर नहीं है। कानूनन 6 वर्ष तक के बच्चे जेलों में अपनी मां के साथ रह सकते है। वर्ष 1999 में उच्चतम न्यायालय के निर्देश उपरांत भी पंजाब की जेलो में कोई सुधार नहीं हुआ। अमृतसर केंद्रीय जेल में पहली बार बच्चों के लिए बाल गृह और नर्सरी खोले गये है, जहां वर्ष 2006 में 9 बच्चें अपनी माताओं के साथ रहे, जबकि पूरे प्रदेश में यह आंकड़ा 374 है। ट्रायॅल आधीन देश में 1031 माता के साथ 1197 बच्चें सजा भुगत रहे है।
डा. कुवर विजय प्रताप सिंह ने अपने अध्ययन में सुझाव दिया है कि महिला कैदियों के लिए अलग जेल, जहां महिला सुपरिटैन्डैंट व महिला स्टाफ का होना चाहिए। जेल में जन्म महिला सुपरिटैंडंट व महिला स्टाफ होना चाहिए। जेल में जन्म लेने वाले बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र में जेल का उल्लेख नहीं होना चाहिए।












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