सीएमओ बीपी सिंह से पहले भी हो चुकी है तीन अधिकारियों की हत्‍या

लखनऊ। उत्‍तर प्रदेश की राजधानी में पिछले दस सालों में चार चिकित्‍सा अधिकारियों की हत्‍या हो गई। इनमें से दो की हत्‍या तो महज छह माह के भीतर हुई है। एक के बाद एक अधिकरियों की हत्‍या से एक बात तो साफ हो गया है कि परिवार कल्‍याण विभाग कहीं न कहीं कुछ तो ऐसा है जो ठीक नही चल रहा। स्‍वास्‍थ विभाग से अलग होने के बाद हत्‍याओं का सिलसिला शुरु हो गया है। यह इस बात का संकेत है कि परिवार कल्याण विभाग के कई हजार करोड़ रुपये के बजट पर अपराधियों की नजरें गड़ी हैं।

23 जुलाई 2000 को हजरतगंज इलाके में मार्निग वाक पर निकले तत्कालीन महानिदेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण डॉ. बच्ची लाल की गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। गोखले मार्ग पर उनका शव बरामद हुआ था। डॉ. लाल की पुत्री अभिलाषा ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। जांच के बाद पुलिस ने पूर्वाचल के बाहुबली नेता समेत पांच लोगों को हत्याकांड का जिम्मेदार माना। विभाग में अपराधियों के दखल का यह पहला मामला था। डॉ. लाल की हत्या के पीछे टेक्नीशियन भर्ती घोटाले को जिम्मेदार ठहराया गया था।

दो आरोपियों को पुलिस ने 5 जुलाई 2001 में मार गिराया था। हालांकि पुलिस की लचर पैरवी के चलते बाकी अभियुक्त मार्च 2001 में कोर्ट से बरी हो गए। डॉ. बच्ची लाल की हत्या के पांच माह बाद स्वास्थ्य विभाग में संयुक्त निदेशक, नर्सिग के पद पर तैनात डॉ. राधेश्याम शर्मा की गोली मार कर हत्या। पुलिस की विवेचना में पता चला था कि डॉ. शर्मा की हत्या विभाग में 600 नर्सो की भर्ती के दौरान वसूली के चक्कर में की गई थी। करीब 10 वर्ष तो शांति से गुजर गए। बीते वर्ष मई में स्वास्थ्य विभाग से परिवार कल्याण विभाग को अलग कर सभी जिलों में सीएमओ परिवार कल्याण का पद सृजित किया। इस नए पद को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए का बजट सौंप दिया गया। इसी के साथ शुरू हो गया खूनी खेल।

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