समाज कल्याण या सोची समझी पटकथा?

समाज कल्याण या सोची समझी पटकथा?
शालू यादव, बीबीसी संवाददाता

जब पता चला कि बिल गेट्स की भारत यात्रा कवर करनी है, तो एक पत्रकार होने के नाते सबसे पहले मैंने अपने 'होमवर्क" के बारे में सोचा. फिर प्लानिंग करना शुरु कर दी.मैं सभी संभावित आंकड़ों और सवालों के साथ तैयार थी. लेकिन शायद किसी भी प्रकार का होमवर्क या प्लैनिंग मुझे इस अनुभव के लिए तैयार नहीं कर सकती थी.

अगली सुबह पटना ज़िले में स्थित जमसौत गांव के लिए निकलना था जहां दुनिया के दूसरे सबसे अमीर आदमी बिल गेट्स पहुंचने वाले थे.बिल गेट्स के वहां पहुंचने से एक घंटे पहले मैं उनकी सुरक्षाकर्मी टीम के साथ वहां पहुंची.हालांकि गांव के लोगों को मालूम नहीं था कि उनके गांव में कौन आने वाला है, लेकिन आने वाली बड़ी हस्ती के लिए वहां स्टेज बहुत अच्छे से तैयार किया गया था. ग़लती की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. मैंने गांव में घूमकर लोगों से उनकी समस्याओं के बारे में जानना चाहा.

समस्याएँ ही समस्याएँ

इधर मेरा माइक बैग से निकला नहीं कि लोगों ने अपनी समस्याओं की छड़ी लगा दी. बस्ती के एक कोने में बर्तन मांज रही एक महिला को मैंने बताया “थोड़ी देर में तुम्हारे गांव में बिल गेट्स नाम का एक बेहद अमीर विदेशी आने वाला हैं. क्या अपनी समस्याओं को उनके सामने रखोगी?"

वो झट बोली, “काहे नहीं बताएंगे, ज़रुर बताएंगे. उनको बताएंगे हमें कैसी कैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. "इतने में बिल गेट्स की बड़ी सी गाड़ी दूर से आती हुई दिखी. वो आए और गांव वालों के साथ पेड़ की छांव में बैठ गए. गांववालों से बातचीत का दौर शुरु हुआ.बिहार के एक स्वास्थय अधिकारी ने गेट्स की बात का तर्जुमा करते हुए गांववालों से पूछा, “दवा-ववा सब बराबर मिलती है न? कौनौ तकलीफ़ तो नाहीं?"

सबने अपने सिर घुमाते हुए कहा नहीं, ''कौनौ तकलीफ़ नाहीं.''

मैंने उस महिला की तरफ देखा जो कुछ ही देर पहले अपनी समस्याओं के बारे में मुझे बता रही थी. उसकी आंखों में जो अदभुत सी चमक थी, वो देखते ही बनती थी.वो उस 'गोरे" को देखकर इतनी उत्साहित थी कि शायद अपनी सभी समस्याएं भूल चुकी थी. घर आए मेहमान के सामने भला कोई अपने दुखड़े रोता है क्या?

और फिर हमारे स्वास्थय अधिकारी साहब ने भी तो सवाल कुछ इस तरह पूछे कि उन बेचारों को शायद समझ ही नहीं आया कि क्या जवाब दें.इसके बाद बिल गेट्स अपनी पत्नी के साथ गांव के स्कूल पहुंचे. वहां का सीन एकदम फिल्मी सेट की तरह था.स्लेट और चॉक हाथ में लिए हुए बच्चे लाइन से बैठे हुए थे. स्लेट पर वर्णमाला के मोती पहले से ही सजा दिए गए थे. स्कूल की दीवार पर वर्णमाला का एक नया नवेला चार्ट लगा हुआ था.

मिड डे मील के लिए चमचमाते हुए नए बर्तन मानो चंद मिनटों पहले ही अलमारी से निकाले गए हों.बिल और मेलिंडा गेट्स ये सब देख कर काफी प्रभावित लग रहे थे.लेकिन ये तस्वीर देखकर कोई भी भारतीय समझ सकता था कि ये एक पटकथा थी जिसे बिल गेट्स के आने से बहुत दिनों पहले से रिहर्स किया जा रहा था.ये एक दुखद सच्चाई है हमारे देश में समाज कल्याण कार्य की.

जिस विकास के लिए सरकारी व निजी संस्थाओं को पैसा दिया जाता है, वो विकास तो बस तब देखने को मिलता है जब पैसा देने वाला आदमी उस गांव का दौरा करता है.बिल गेट्स या सरकार इस गांव का दौरा करने शायद फिर दोबारा न आएं लेकिन जिन हाथों में इन लोगों का भविष्य सौंप दिया जाता है, उनकी जवाबदेही का क्या?

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