सीमित समय का करें पूरा उपयोग
जोगिन्दर सिंह
नई दिल्ली, 25 फरवरी (आईएएनएस)। आप जो भी काम करना चाहते हैं, उसके लिए लक्ष्य और समय-सीमा तय कर लें। यह तकनीक आपको कभी पिछड़ने नहीं देगी और आप बखूबी अपने दायित्व निभा पाएंगे। लगातार यह सोचते हुए समय न गवाएं कि इसके बाद क्या किया जाए? जो काम अगले दिन शुरू करना है, उसकी तैयारी एक रात पहले कर लें।
टेलीफोन भी हमारे जीवन का एक हिस्सा बन गया है। टेलीमार्केटिंग हमारे लिए सिरदर्द बन गई है। जब भी घंटी बजे तो फोन उठाना जरूरी नहीं है। यदि आपने ऐसा किया तो आपको उन्हीं लोगों से बात करनी पड़ सकती है जिनसे आप बचना चाहते हैं।
अपनी फोन कॉल छांटकर उन्हें उत्तर दें, जिन्हें उत्तर देना आपको वाजिब लगे। साथ ही अपने खाली समय में ही मित्रों व रिश्तेदारों को फोन करें। जब मैं किसी को फोन करता हूं तो पूछ लेता हूं कि क्या वह इस समय बात करने के लिए 'फ्री' हैं या मैं किसी और समय फोन करूं?
इससे उस पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। एक रात पहले की गई तैयारी से काम आपके सिर पर हावी नहीं होगा। मेरा निजी अनुभव तो यही कहता है कि उत्तेजना का एक भी पल आपकी याददाश्त को कमजोर कर सकता है। यहां तक कि आपके खास काम को भुला सकता है।
जब मुझे कहीं बाहर या अपनी मां से मिलने जाना होता है तो मैं सूटकेस अपने कमरे में रखता हूं, ताकि अपना जरूरी सामान व लोगों के लिए ले जाने वाले तोहफे उसमें रख सकूं। इससे मेरे काम का बोझ काफी घट जाता है। मेरी नौकरानी भी सुबह की चाय-ट्रे की तैयारी रात को ही कर लेती है। नतीजतन, उसे सुबह टी-बैग, शुगर कप और धुले बर्तनों में भी कप नहीं तलाशने पड़ते। इस तरह दिन में मैं कभी भी चाय या कॉफी आराम से ले सकता हूं।
मुझे अपनी बिजली वाली केटली का बटन दबाना पड़ता है। कप में दूध, चीनी, कॉफी डालो और गर्म पानी मिला दो, बस कॉफी तैयार हो गई। इस प्रक्रिया में तीन मिनट से भी कम समय लगता है। ऐसे बहुत से काम हैं जिनकी तैयारी रात को ही की जा सकती है, जैसे स्कूल जाने वाले बच्चों की वर्दी तैयार करना।
समय की बर्बादी का एक बड़ा माध्यम है टीवी। मैं केवल एक घंटे तक टीवी देखता हूं। यहां तक कि टीवी देखते-देखते भी मैं कोई न कोई दूसरा काम हाथ में लिए रहता हूं। मैं जानता हूं कि एक समय में मैं काफी टीवी देखता था, उन कार्यक्रमों का मेरी नौकरी या काम से कोई लेना-देना नहीं था। सन् 1969 में हमारा पहला टीवी आया। वह ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का जमाना था।
बहुत कम लोगों के पास यह यंत्र था। कार्यक्रमों का प्रसारण केवल दो घंटे तक होता था जो बाद में बढ़कर तीन घंटे कर दिया गया। एशियन गेम्स के आसपास रंगीन टीवी आए। अब देश में 300 से भी ज्यादा चैनल हैं। वे सब विज्ञापनों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, दो घंटे की फिल्म समाप्त होते-होते पांच घंटे लग जाते हैं। इस तरह टीवी पर इतिहास देखने का कोई तुक नहीं है। क्यों न हम इसी समय के सदुपयोग से नया इतिहास बनाएं?
मिसाल के तौर पर मैं यह लेख लिखते समय टीवी पर इस्लाम व मोहम्मद के जन्म की एक फिल्म 'द पैसेंजर' देख रहा हूं। मैं हर कुछ मिनट बाद सिर उठाकर डायलॉग सुन लेता हूं और फिर लिखने लगता हूं। मैं हालांकि मानता हूं कि सभी लोग इस तरह की दो दिमागी गतिविधियां एक साथ नहीं कर सकते, लेकिन महिलाएं टीवी देखते समय सब्जी काट-छांट सकती हैं, स्वेटर बुन सकती हैं या फिर फोन पर बात कर सकती हैं।
कई बार मैं अपने मनपसंद कार्यक्रम रिकार्ड कर लेता हूं, ताकि उन्हें खाली समय में देख सकूं। आप अपने मनपसंद रेडियो कार्यक्रम सुनने के लिए भी ऐसा कर सकते हैं। मेरे पास एक वॉकमैन है जिसका मैं सैर के दौरान पूरा इस्तेमाल करता हूं।
मेरी तरह और लोगों को भी अपनी मुलाकातें याद रखने में दिक्कत आती है। हर व्यक्ति याद रखने के लिए अलग तरीका इस्तेमाल करता है। कुछ लोग इसे डायरी में लिखते हैं, कुछ लोग कंप्यूटर की मेमोरी में डाल देते हैं या कुछ लोग बाथरूम के शीशे पर लिखकर चिपका देते हैं। इसके लिए कोई बंधा-बंधाया नियम नहीं है, लेकिन खास बात यह है कि आप सुबह उठते ही देख लें कि आपको किससे, कब और कितने बजे मिलना है।
एक बड़ी समस्या यह भी है कि लोग समय के पाबंद नहीं हैं। पिछले सप्ताह मैं एक कार्यक्रम में गया। समारोह दोपहर 12.30 बजे था। उसके बाद पंचतारा होटल में लंच था, लेकिन दो बजे तक मुख्य अतिथि का पता नहीं मिला तो मैं वहां से लौट आया। बाद में एक मित्र से पता चला कि मुख्य अतिथि उस दिन तीन बजे आए थे। मैंने उनसे कहा कि उन्हें देर से आने की यही सजा मिली कि वह मुझसे नहीं मिल पाए। इसलिए आप कोई भी ऐसा तरीका अपनाएं जिससे आपकी उत्पादकता बढ़ सके।
मैं पिछले माह चंडीगढ़ में था। एक फिल्मी नायक और नायिका वहां शूटिंग कर रहे थे। नायक ने मुझे अपना प्रदर्शन देखने के लिए निमंत्रित किया तो मैंने धन्यवाद देकर कहा कि मैंने दिल्ली में पहले से किसी को वक्त दे रखा है। मेरा उससे मिलना जरूरी है। यदि वे दिल्ली आएं तो मुझे उनसे मिलकर बड़ी खुशी होगी।
रेलवे स्टेशन पर मेरा एक मित्र मुझे लेने आया। उसने यह बात सुनी तो बोला, "यार! तुम्हें इस निमंत्रण के लिए हां कर देना था।" मैंने उत्तर दिया, "वो एक्टर मुझे भी पसंद है लेकिन उसके लिए मैं अपनी प्राथमिकता नहीं भूल सकता।"
यह सब मैं आपको इसलिए बता रहू हूं कि ताकि आप जान जाएं कि हर विनती के लिए 'हां' कहना जरूरी नहीं होता। हां, हम थोड़े समय का फेर-बदल करके काम कर सकते हैं, लेकिन ऐसा मासिक तौर पर करना ही ठीक होगा। यह सब बताने का एक ही अर्थ है कि आप सीमित समय का पूरा उपयोग करें और उसकी उत्पादकता को अपने वश में कर लें।
(लेखक सीबीआई के पूर्व निदेशक हैं। डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा. लि., नई दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'सफलता का जादू' से साभार)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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