गर्मागर्म बहस और तीखी नोकझोंक के बाद गठित हुई जेपीसी (राउंडअप)
केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जेपीसी के गठन के लिए लोकसभा में एक प्रस्ताव पेश किया। समिति को इस वर्ष के मानसून सत्र के अंत तक अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है।
मुखर्जी ने बताया कि समिति में अध्यक्ष सहित 30 सदस्य होंगे। इसमें 20 सदस्य लोकसभा से और 10 राज्यसभा से शामिल होंगे।
उन्होंने बताया, "समिति वर्ष 1998 से 2009 के दौरान सरकारों की दूरसंचार नीतियों और नीतियों की व्याख्या की जांच करेगी। इसके अलावा समिति स्पेक्ट्रम आवंटन और दूरसंचार लाइसेंस की कीमतों के निर्धारण के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णयों और उनके परिणामों को भी देखेगी।"
मुखर्जी ने बताया कि वर्ष 1998 से 2009 की अवधि में "यदि कोई अनियमितता बरती गई तो समिति उसकी जांच करेगी और वह सरकार के निर्णयों और दूरसंचार नीतियों को लागू करने पर प्राप्त परिणामों को भी देखेगी।"
उन्होंने कहा कि समिति को दूरसंचार लाइसेंस के मूल्य निर्धारण और आवंटन में नीतियों को उपयुक्त तरीके से लागू करने के लिए अपनी सिफारिशें देने का कार्य दिया गया है।
जांच समिति में कांग्रेस के लोकसभा के आठ सदस्य होंगे। इनमें पी.सी. चाको, मनीष तिवारी, जय प्रकाश अग्रवाल, अधीर रंजन चौधरी, वी. किशोर चंद्र देव, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, निर्मल खत्री और प्रबण सिंह घाटोवर शामिल हैं।
समिति में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लोकसभा सदस्य जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, हरीन पाठक और गोपीनाथ मुंडे शामिल हैं।
समिति में शामिल अन्य सदस्यों में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के टी.आर. बालू, तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी, जनता दल(युनाइटेड) के शरद यादव, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के दारा सिंह चौहान, समाजवादी पार्टी (सपा) के अखिलेश यादव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के गुरुदास दासगुप्ता, बीजू जनता दल (बीजद) के अर्जुन चरण सेठी और ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के एम.थम्बी दुरई शामिल हैं।
मुखर्जी ने लोकसभा के अध्यक्ष मीरा कुमार को इन सदस्यों में से किसी एक सदस्य को समिति का अध्यक्ष मनोनीति करने के लिए कहा।
सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस केरल के सांसद चाको को समिति का अध्यक्ष बनाने का विचार 'कमोबेश' बना चुकी है।
यह प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हुआ लेकिन इससे पहले पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार बहस और तीखी नोकझोंक भी हुई।
प्रणब ने कहा, "विपक्ष की जेपीसी की मांग के चलते संसद का पिछला शीतकालीन सत्र पूरा का पूरा बर्बाद हो गया। हमें इसका खेद है। इस मसले पर विपक्ष की भावना का आकलन करने में मैं असफल रहा।"
उन्होंने कहा, "2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले से जुड़ी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट पर तीन पहलुओं पर कार्रवाई हो रही थी। लेखा सम्बंधी मामले की जांच लोक लेखा समिति (पीएसी) कर रही थी, आपराधिक व अन्य मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कर रही थी जबकि नीतिगत मामलों की जांच के लिए एक सदस्यीय आयोग का गठन किया गया था। इसलिए हम समझ रहे थे कि जेपीसी की कोई आवश्यकता नहीं थी।"
उन्होंने कहा, "तहलका के समय हम भी जेपीसी की मांग कर रहे थे उस समय अरुण जेटली ने कहा था कि सदन के पटल पर चर्चा से बेहतर कोई अन्य समूह नहीं हो सकता।"
प्रणब ने इस दौरान संसदीय कार्यवाही बाधित होने पर चिंता जताई और भविष्य में इसकी पुनरावृति न हो, इसके ठोस उपाय किए जाने पर जोर दिया।
उन्होंने पाकिस्तान का नाम लिए बगैर 10 अक्टूबर 1958 की वहां की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वहां तीन दिनों में तीन प्रधानमंत्रियों ने शपथ ली और उपाध्यक्ष को सदन में गोली मार दी गई थी। "मैं भारत में ऐसी परिस्थिति की कल्पना नहीं कर रहा लेकिन यदि विधायिका अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करेगी तो ऐसी ही स्थिति पैदा होगी जो किसी को स्वीकार्य नहीं होगी।"
इस दौरान संसद की कार्यवाही बाधित न किए जाने के मसले पर प्रणब और सुषमा ने एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए। प्रणब ने जहां पिछले शीतकालीन सत्र को बर्बाद करने के लिए विपक्ष को आड़े हाथों लिया वहीं सुषमा ने विपक्ष की मांग को जायज ठहराने की कोशिश की।
मुखर्जी ने प्रस्ताव पेश करते हुए संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में सदन की कार्यवाही बाधित होने का जिक्र करते हुए कहा, "पूरा का पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। मैं इसमें नहीं पड़ना चाहता कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है और कौन नहीं लेकिन संसद की कार्यवाही का न चलना एक गम्भीर मसला है। भविष्य में संसद में इस प्रकार का व्यवधान न डाला जाए इसके लिए हमें समाधान निकालना जरूरी है।"
उन्होंने कहा, "मैं राज्यों की विधानसभा की कार्यवाही भी देखता हूं। हर राज्य विधानसभा में इसी प्रकार का व्यवधान पड़ रहा है। संसदीय लोकतंत्र के लिए यह सेहतमंद नहीं है।"
इसके बाद जब सुषमा स्वराज ने बहस में हिस्सा लिया तो उन्होंने प्रणव के पूर्व के बयानों का जिक्र करते हुए उनकी आलोचना की। सुषमा ने कहा, "मुखर्जी ने हमारी जेपीसी मांग को अतार्किक करार देते हुए पिछले दिनों कहा था कि हमें नक्सलियों के साथ हो जाना चाहिए।"
उन्होंने कहा, "तहलका के मुद्दे पर हम सत्ता में थे और कांग्रेस विपक्ष में थी। उस समय जेपीसी की मांग को लेकर आपने 77 घंटे संसद नहीं चलने दी थी तो 600 में से सिर्फ 66 सवाल ही प्रश्नकाल के दौरान पूछे जा सके थे। क्या वह आपका नक्सली व्यवहार था।"
उन्होंने कहा कि 77 घंटे मतलब लगभग 12 दिन संसद की कार्यवाही आपने बाधित की थी और हमने 15 दिन कार्यवाही नहीं होने दी तो महज तीन दिनों में हम नक्सली हो गए। सुषमा ने फिल्मी अंदाज में कहा, "प्रणब बाबू जिनके घर शीशे के होते हैं वह दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं उछाला करते।"
प्रणब मुखर्जी पर चुटकी लेते हुए सुषमा ने कहा, "प्रणब बाबू आप बहुत अच्छे हैं। अनुभवी भी हैं लेकिन जब आपको गुस्सा आता है तो आप उचित और अनुचित का ध्यान भूल जाते हैं।"
बहस के दौरान मुखर्जी उठ-उठ कर सुषमा की बातों का जवाब भी दे रहे थे। उन्होंने नक्सल सम्बंधी अपने बयान के बारे में सफाई दी। उन्होंने यह भी कहा कि तहलका पर जेपीसी की मांग को लेकर ही सिर्फ 77 घंटे कार्यवाही नहीं हुई थी, उसमें अन्य मुद्दे भी थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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