सुषमा और प्रणब में हुई तीखी नोकझोंक
संसद की कार्यवाही बाधित न किए जाने के मसले पर प्रणब और सुषमा ने एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए। प्रणब ने जहां पिछले शीतकालीन सत्र को बर्बाद करने के लिए विपक्ष को आड़े हाथों लिया वहीं सुषमा ने विपक्ष की मांग को जायज ठहराने की कोशिश की।
मुखर्जी ने प्रस्ताव पेश करते हुए संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में सदन की कार्यवाही बाधित होने का जिक्र करते हुए कहा, "पूरा का पूरा शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। मैं इसमें नहीं पड़ना चाहता कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है और कौन नहीं लेकिन संसद की कार्यवाही का न चलना एक गम्भीर मसला है। भविष्य में संसद में इस प्रकार का व्यवधान न डाला जाए इसके लिए हमें समाधान निकालना जरूरी है।"
उन्होंने कहा, "मैं राज्यों की विधानसभा की कार्यवाही भी देखता हूं। हर राज्य विधानसभा में इसी प्रकार का व्यवधान पड़ रहा है। संसदीय लोकतंत्र के लिए यह सेहतमंद नहीं है।"
इसके बाद जब सुषमा स्वराज ने बहस में हिस्सा लिया तो उन्होंने प्रणव के पूर्व के बयानों का जिक्र करते हुए उनकी आलोचना की। सुषमा ने कहा, "मुखर्जी ने हमारी जेपीसी मांग को अतार्किक करार देते हुए पिछले दिनों कहा था कि हमें नक्सलियों के साथ हो जाना चाहिए।"
उन्होंने कहा, "तहलका के मुद्दे पर हम सत्ता में थे और कांग्रेस विपक्ष में थी। उस समय जेपीसी की मांग को लेकर आपने 77 घंटे संसद नहीं चलने दी थी तो 600 में से सिर्फ 66 सवाल ही प्रश्नकाल के दौरान पूछे जा सके थे। क्या वह आपका नक्सली व्यवहार था।"
उन्होंने कहा कि 77 घंटे मतलब लगभग 12 दिन संसद की कार्यवाही आपने बाधित की थी और हमने 15 दिन कार्यवाही नहीं होने दी तो महज तीन दिनों में हम नक्सली हो गए। सुषमा ने फिल्मी अंदाज में कहा, "प्रणब बाबू जिनके घर शीशे के होते हैं वह दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं उछाला करते।"
प्रणब मुखर्जी पर चुटकी लेते हुए सुषमा ने कहा, "प्रणब बाबू आप बहुत अच्छे हैं। अनुभवी भी हैं लेकिन जब आपको गुस्सा आता है तो आप उचित और अनुचित का ध्यान भूल जाते हैं।"
बहस के दौरान मुखर्जी उठ-उठ कर सुषमा की बातों का जवाब भी दे रहे थे। उन्होंने नक्सल सम्बंधी अपने बयान के बारे में सफाई दी। उन्होंने यह भी कहा कि तहलका पर जेपीसी की मांग को लेकर ही सिर्फ 77 घंटे कार्यवाही नहीं हुई थी, उसमें अन्य मुद्दे भी थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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