अनाज की कीमतों की गरीबों पर मार

अनाज की क़ीमतों की ग़रीबों पर मार
विश्व बैंक का कहना है कि पिछले साल जून से खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में भारी बढ़ोत्तरी ने साढ़े चार करोड़ लोगों ग़रीबी की रेखा से नीचे धकेल दिया है.

विश्व बैंक के अनुसार खाद्यान्न इंडेक्स की पिछले चार महीनों में ही 15 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है और ये पिछले तीन साल के उच्चतम स्तर के नजदीक पहुँच गया है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गेहूँ, मक्का, चीनी और खाद्य तेलों की क़ीमतों में भारी बढ़ोत्तरी हुई है.

विश्व बैंक के प्रमुख रॉबर्ट ज़ोएलिक का कहना है कि क़ीमतें ख़तरनाक स्तर तक पहुँच गईं हैं और इससे समाज के कमजोर तबके पर दबाव बढ़ गया है. उनका कहना था कि ये तबका अपनी आधी कमाई खाने पर खर्च करता है.

उल्लेखनीय है कि 2008 में कई देशों में खाद्य सामग्री की इतनी अधिक हो गई थी कि उसको लेकर दंगे शुरू हो गए थे. उन दंगों में हज़ारों लोग मारे गए थे.

चेतावनी

जानकारों का कहना है कि क़ीमतों का बढ़ना आगे भी जारी रह सकता है. इसके पहले विश्व खाद्य कार्यक्रम ने चेतावनी दी थी कि अगर खाद्यान्न की क़ीमतें ऐसे ही बढ़ती रहीं तो उसका बजट फेल हो जाएगा.

विश्व खाद्य कार्यक्रम 1990 से खाद्यान्नों की क़ीमतों को रिकॉर्ड कर रहा है और उसका कहना है कि खाद्यान्न की क़ीमतें रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँच गई है. दुनियाभर में विश्व खाद्य कार्यक्रम नौ करोड़ लोगों को खाद्य सहायता देता है और ये खाद्यान्न वो उसी देश से ख़रीदता है जहाँ उसे सहायता देनी होती है.

अभी दुनिया में गेहूं की मांग बढ़ रही है आपूर्ति कम है, ऐसे में गेहूं उत्पादन करने वाले किसी भी क्षेत्र में अगर फसल को नुक़सान होता है तो क़ीमतें 2008 के रिकॉर्ड को तोड़ सकती है.

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