आम आदमी हैरान, किसका हो रहा है आर्थिक विकास (लेख)

नई दिल्ली, 9 फरवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन द्वारा सोमवार को जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार देश मौजूदा वित्तीय वर्ष में 8़ 6 प्रतिशत की दर से विकास करेगा। लेकिन इन दिनों आर्थिक विकास दर के ऐसे लुभावने आंकड़ों को लेकर आम आदमी भौंचक्का है।

उसे समझ में नहीं आ रहा है कि अगर देश इतनी तेजी से विकास कर रहा है तो उसका विकास क्यों नहीं हो रहा है, क्यों उसकी कमर मंहगाई से टूटी हुई है, क्यों उसके घर में खाने पीने की वस्तुओं के लाले पड़ते जा रहे हैं। क्यों उसके बच्चों के स्कूल की इमारत दुरूस्त नहीं हो पाई है, क्यों उसे राशन की दुकान से सस्ता राशन नहीं मिल रहा है, क्यों उसके नल में साफ पानी नहीं आ रहा है और क्यों उसे सोलह-सोलह घंटे बिना बिजली के रहना पड़ता है, क्यों स्कूल की फीस देने के लिए उधार मांगने की जरूरत पड़ने लगी है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले लगभग डेढ़ दशक से हमारी विकास दर लगातार बेहतर बनी हुई है। पर देश की 95 फीसदी जनता-जिसमें गरीब और मध्यम वर्ग शामिल है, लगातार पिछड़ता हुआ महसूस कर रहा है।

महानगरों में रहने वाले उच्च मध्यम वर्ग के अतिरिक्त इस आर्थिक विकास का मतलब शायद ही कोई ठीक से समझ पा रहा हो।

जिन पर परिवार चलाने की जिम्मेदारियां हैं, वे आठ प्रतिशत से अधिक की विकास दर के आंकड़ों की घोषणाओं के बाद यह तय नहीं कर पाते हैं कि हंसे यां रोएं। रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाली वस्तुएं- आटा, दाल, चावल, तेल, साबुन, कॉपी, किताब, रसोई गैस- सभी कुछ लगातार महंगा हो रहा है। पर बकौल सरकार हमारा आर्थिक विकास हो रहा है।

जिन चीजों पर सरकार सब्सिडी देने का दावा करती है मसलन किरोसिन तेल, सस्ता राशन, सरकारी स्कूलों में शिक्षा आदि, वे या तो आम आदमी को मुहैया ही नहीं हैं और हैं भी तो इस हालत में कि न उनका इस्तेमाल हो सकता है और न छोड़ा जा सकता है।

आम आदमी के कुछ सीधे सवाल हैं। अगर देश की विकास दर इतनी अच्छी है तो हर महीने उसकी क्रय शक्ति कम क्यों हो रही है। उसकी बचत बढ़ने के बजाए हर साल कम क्यों होती जा रही है। वह क्यों हर महीने की बीस तारीख को उधार लेकर दो वक्त भरपेट खाना खाने की जुगत लड़ाता है? क्यों उसे सरकारी अस्पताल में न इलाज की सुविधा है न ही दवा मिलती है? आम आदमी अपना काम ईमानदारी से कर रहा है, सारे कर अदा करता है, नियमों का पालन करता है और कानून से उसकी घिग्घी बंधी रहती है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार कृषि क्षेत्र की विकास दर इस वित्तीय वर्ष में 5़ 4 प्रतिशत रहने का अनुमान है जबकि पिछले साल यह केवल 0़ 4 प्रतिशत थी।

जनसाधारण के लिए ये जादुई आंकड़ें एक पहेली हैं कि कृषि विकास दर इतनी अच्छी है तो किसानों द्वारा आत्महत्याओं का सिलसिला क्यों जारी है। सन 1997 से लेकर अब तक हमारी विकास दर इतनी अच्छी बनी हुई है कि हम विश्व में आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहे हैं। पिछले लगभग डेढ़ दशक में हमारी वार्षिक आर्थिक विकास दर औसतन सात से साढ़े सात प्रतिशत के बीच रही है।

इन्हीं वर्षो के दौरान देश में कम से दो लाख किसानों ने गरीबी और कर्ज से तंग आकर आत्महत्या कर ली। ये वो मामले हैं जिनके बारे में पता चला है।

ग्रामीण भारत में शिक्षा, रोजगार, बुनियादी ढांचे की हालत में बहुत कम सुधार हुआ है और ज्यादातर जगहों पर स्थिति पहले से खराब हुई है। महानगरों से बाहर निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों में जाने पर आंखों देखी स्थिति से पता चलता है कि चिकने कागज पर छपे सरकारी विज्ञापनों से झांकते खुशहाल चेहरों और गर्द से अटे रास्तों पर चिंताग्रस्त आम आदमी में कितना अंतर है।

ऐसा लगने लगा है कि विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग और सरकारी तंत्र हाथों में हाथ डाले एक ऐसी विज्ञापन कंपनी के रूप में काम कर रहे हैं जिसका काम सपने दिखा कर आकर्षक शैली में अपनी तथाकथित उपलब्धियों का 'माल' जनसाधारण यानी भोले ग्राहकों को बेचना है।

विकास दर आगे है तो, जनता पीछे क्यों है? ऐसे सवालों के जवाब ढूंढ़ने की कोशिश में आम आदमी थकता जा रहा है कि क्यों आर्थिक विकास के नित नए स्थापित होते कीर्तिमान उसके थैले में कम होते जा रहे अनाज और सब्जियों की मात्रा को इतना भी नहीं बढ़ा पा रहे हैं कि वह सम्मान से जी ले और भरपेट खा ले। अगर ऐसा नहीं हो सकता तो यह आर्थिक विकास दर किस काम की?

बेहतर विकास दर का मतलब है ज्यादा संपन्नता। लेकिन देश के 95 प्रतिशत लोग पिछले कुछ सालों से अपने को पहले से ज्यादा गरीब महसूस कर रहे हैं।

आम आदमी पहले से ज्यादा कर दे रहा है और उसके बदले में मिलने वाली सार्वजनिक सुविधाओं की हालत पहले से ज्यादा खस्ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सफाई, बिजली, पानी- सभी की आपूर्ति की मात्रा और स्तर पहले से ज्यादा खराब है। इनमें सुधार की कोई आशा भी नहीं। केंद्र सरकार राज्यों पर जवाबदेही डाल देती है, राज्य सरकार स्थानीय निकायों पर और स्थानीय निकाय पैसे की कमी का रोना रोते हैं।

लोग भौंचक्के हैं कि विकास दर इतनी अच्छी है तो सारा पैसा गया कहां ? विकास दर का लाभ किसे हुआ। हमें विकास दर का लाभ क्यों नहीं हुआ? क्या वाकई इतना विकास हुआ भी? अगर देश की आर्थिक विकास दर अच्छी होने की बात कह अपनी पीठ ठोकी जाती है तो लाभ सभी को मिलना चाहिए था। लेकिन नहीं मिला। उल्टा आम आदमी की स्थिति और बुरी हुई है। लेकिन सरकार खुश होकर अपनी पीठ ठोक रही है कि विकास जारी है और पहले से कहीं ज्यादा तेज गति से जारी है। लोग हैरान हैं कि किसका हो रहा है आर्थिक विकास?

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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