विकास को बढ़ावा देने वाले कानून की जरूरत : प्रधानमंत्री (लीड-1)
सिंह ने यहां आयोजित 17वें राष्ट्रमंडल कानून सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा, "विकासशील देशों को एक ऐसी कानून प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है, जो तीव्र आर्थिक विकास और साथ ही विकास की उपलब्धियों के समान वितरण को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त हो।"
मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार समग्र आर्थिक वृद्धि हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रधानमंत्री ने राष्ट्रमंडल के 54 देशों से आए 800 से अधिक न्यायाधीशों, वकीलों और अन्य कानूनी पेशेवरों के समूह को सम्बोधित करते हुए कहा, "गरीबों और आम आदमी का कल्याण हमारी नीति का केंद्रीय विषय है।"
सिंह ने दावा किया कि भारत की आर्थिक वृद्धि की कहानी, समतावादी समाज के नेहरूवादी दर्शन में प्रमुखता के साथ उपस्थित है।
सिंह ने कहा, "हम संवैधानिक निर्देशों के क्रियान्वयन के प्रति अपनी वचनबद्धता को लेकर दृढ़ हैं, ताकि हमारी नीतियां और कानून मानवीय गरिमा को बनाए रख सकें। पिछले वर्षो के दौरान अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बनाने एवं उसे नौकरशाही के चंगुल से मुक्त कराने में हमने अपने शानदार संविधान में वितरणात्मक न्याय को अनिवार्य बनाने के लिए प्रयास किए हैं।"
संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि समग्र वृद्धि एक समाप्त न होने वाली परियोजना है और देश को इस दिशा में एक लम्बी दूरी तय करनी है।
सिंह ने तेजी के साथ बदलती दुनिया में खुद में लगातार बदलाव लाने के लिए कानूनी व्यवस्था को रेखांकित किया।
सिंह ने कहा, "अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए यह एकमात्र रास्ता है। इस संदर्भ में कानून को सामाजिक स्थिरता एवं प्रगतिशील बदलाव का एक साधन बनाने में अदालतों एवं न्यायाधीशों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।"
प्रधानमंत्री ने कहा कि कानून के शासन को अधिक समय तक वैश्विक नीति की चुनौतियों से अलग नहीं रखा जा सकता।
सिंह ने कहा, "विश्व समुदाय के सामने घरेलू नीतियों एवं कानूनों के एक उद्देश्यपरक एकीकरण की समग्र मांग के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कानूनों एवं नियमों के निर्माण की चुनौतियां हैं। मानवता के समक्ष खड़ी इन चुनौतियों से निपटना जरूरी है। इनमें अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, गरीबी, तीव्र वृद्धि के बीच कुपोषण, जलवायु परिवर्तन एवं ऊर्जा सुरक्षा की समस्याएं शामिल हैं।"
सिंह ने कहा, "कानून के शासन पर आधारित लोकतंत्र के प्रति स्थिर वचनबद्धता स्वतंत्रता के समय से ही भारत की गौरवशाली उपलब्धि रही है। लोकतांत्रिक एवं न्यायप्रिय समाज के प्रबल समर्थक के रूप में कानून के शासन की हमारी समझ हमारे सभी नागरिकों की व्यक्तिगत स्वच्छंदता एवं आजादी को बनाए रखने से अभिन्नरूप से जुड़ी हुई है।"
प्रधानमंत्री ने कहा, "हमारा मानना है कि राज्य की ताकत को हमारे सभी नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों के अभ्युदय के लिए लगाया जाए, लेकिन यहीं पर राज्य की यह ताकत कानून के शासन से इतना नियंत्रित हो कि वह किसी व्यक्ति के नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों को पुष्ट कर सके और दमनकारी शासन पर रोक लगा सके।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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