बिहार में गुमटी में चलती है अनोखी पाठशाला
पटना, 6 फरवरी (आईएएनएस)। आपने कई विद्यालयों के बड़े-बड़े भवनों में छात्रों को अध्ययन करते हुए देखा होगा, लेकिन अगर कोई विद्यालय एक छोटी सी गुमटी में चलता हो तो आपको शायद आश्चर्य होगा। मगर यह सच है। बिहार के पटना जिले के बाढ़ में एक ऐसा ही विद्यालय चल रहा है और इसको चलाने वाला जूता-चप्पल बनाने वाला एक कारीगर है।
बाढ़ थाना के पास 67 वर्षीय रामाशीष दास न केवल एक गुमटी में अपना दुकान चलाते हैं, बल्कि यहां वह स्थानीय बच्चों को शिक्षा भी देते हैं। इस विद्यालय का कोई समय निश्चित नहीं है। जब बच्चे आ जाते हैं, तभी उनकी पाठशाला प्रारंभ हो जाती है। यही कारण है कि यह पाठशाला दिनभर लगी रहती है।
बाढ़ के पुराना बाजार मुहल्ला निवासी दास बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1976 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी तो परिजनों के दबाव के कारण वह रोजगार के लिए पटना चले गए, लेकिन उसका मन वहां नहीं लगा और वह फिर बाढ़ चले आए। यहां आने के बाद भी परिवारों ने उन पर कमाने का दबाव बनाए रखा।
दास ने बाढ़ में जूता-चप्पल बनाने की दुकान तो अवश्य खोल दी, लेकिन इस दौरान उन्हें शिक्षा दान करने का जुनून सवार हो गया। वह कहते हैं कि प्रारंभ में तो वह आसपास गरीबों के बच्चों को उनके घर से लाकर अपनी दुकान में बैठाकर पढ़ाते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी दुकान में आकर पढ़ने वाले छात्रों की संख्या बढ़ती गई। दास कहते हैं कि वह दुकान आठ बजे सुबह खोलते हैं, तभी से वहां छात्र-छात्राओं की भीड़ लगी रहती है।
दास कहते हैं, "मैं किसी छात्र से पैसा नहीं लेते। ऐसा नहीं कि मेरे पास पढ़ने वाले विद्यार्थियों का नामांकन सरकारी विद्यालयों में नहीं है, लेकिन वे वहां पोषाहार योजना और मध्याह्न् भोजन योजना का लाभ लेने जाते हैं। शेष समय वे यहीं पढ़ते हैं।"
दास बड़े फख्र से कहते हैं, "मेरे पास पढ़े बच्चे आज कई बैंकों में नौकरी कर रहे हैं तो दो-तीन इंजीनियर भी बन गए हैं।"
दास के दो पुत्र हैं। एक पुत्र दिल्ली में नौकरी करता है और दूसरा यहीं अपने पिता के काम में हाथ बंटाता है। वह कहते हैं, "मेरी जाति के लोगों को समाज में अंतिम पायदान पर रखा जाता है, यह काम कर उन्हें सुकून अवश्य मिलता है।" उनकी गुमटी में स्थान नहीं रहता है तो बच्चे गुमटी के आसपास बैठ जाते हैं।
वह कहते हैं कि अब तो उनके पास जूता-चप्पल बनावाने के लिए लोग कम आते हैं। अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए लोग ज्यादा आते हैं। दास की इच्छा है कि जब तक सांस रहे तब तक वह बच्चों को पढ़ा सकें।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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