बंगाल की बिरहर जनजाति विलुप्ति के कगार पर
कोलकाता, 6 फरवरी (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल की घुमंतू बिरहर जनजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है। पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में करीब 10,000 बिरहर रहते हैं।
बिरहरों को छोटानागपुर पठार की मुंडा जनजाति का ही एक हिस्सा माना जाता है। पश्चिम बंगाल जनजातीय विकास सहकारी निगम लिमिटेड (डब्ल्यूटीडीसीसीएल) द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक अन्य राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल के बिरहरों की स्थिति बहुत खराब है।
अध्ययन दल की सदस्य श्रीरूपा रॉय ने आईएएनएस को बताया, "राज्य सरकार उनके विकास के लिए कई कार्यक्रम चला रही है लेकिन इसके बावजूद वे अब तक विलुप्ति के कगार पर हैं।"
रॉय ने बताया, "सरकार की ओर से गई पहल झारखण्ड में रहने वाले बिरहरों को विकास के फायदों के प्रति संवेदनशील बनाने में सक्षम थी लेकिन इस जनजाति के पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोग अपने घुमंतू जीवन को त्यागने और खुद को विकास योजनाओं से जोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।"
पश्चिम बंगाल की जनजातीय जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक 1991 में बिरहरों की संख्या 855 थी। उनमें से 271 पुरूलिया में रहते थे जबकि बाकी बचे हुए बांकुड़ा, पश्चिमी मिदनापुर और राज्य के उत्तरी भाग के वन क्षेत्रों में फैले हुए थे।
जनजातीय आबादी के लिए सामाजिक व आर्थिक सशक्तिकरण और उनके लिए खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार व आय को बढ़ावा देने के मकसद से यह अध्ययन किया गया था।
रॉय कहती हैं कि दो दशकों के लम्बे समय के बाद पुरूलिया में बिरहरों की संख्या बढ़कर केवल 327 या 80 परिवार हो सकी है।
हाल के कुछ समय तक बिरहर घुमंतू जीवन ही जी रहे थे और वे भोजन, जीविका व आवास के लिए जंगलों पर निर्भर थे। अन्य जनजातियां बिरहरों के जीवन स्तर के चलते उन्हें नीची निगाह से देखती हैं।
अध्ययन के मुताबिक, "जंगल बिरहरों की संस्कृति और परम्परा का अभिन्न हिस्सा हैं। गृह मंत्रालय ने पांचवी पंचवर्षीय योजना के तहत उन्हें अनुसूचित आदिम जनजाति वर्ग में रखा था। सरकार उनके लिए समय-समय पर विकास सम्बंधी पहलें करती रही है।"
'पुरूलिया पम्प स्टोरेज प्रोजेक्ट' के तहत बिरहरों को 2008 में अयोध्या पहाड़ियों में झोपड़ीनुमा घरों में बसाने की कोशिश की गई लेकिन वे अब भी जंगलों को प्राथमिकता देते हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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