फैज की रचनाएं आज भी प्रासंगिक : मोनीजा हाशमी

मुम्बई, 6 फरवरी (आईएएनएस)। बीसवीं सदी के प्रख्यात पाकिस्तानी उर्दू शायर फैज अहमद फैज की बेटी मोनीजा हाशमी का कहना है कि फैज की रचनाएं आज भी मौजूदा विश्व की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का बखूबी बयान करती हैं।

हाशमी कहती हैं कि पिता की नज्में उनमें उम्मीद पैदा करती हैं। उन्होंने कहा कि यह बहुत रोमांचक अनुभव है कि उनकी मौत के 26 साल बाद भी उनकी रचनाएं प्रासंगिक नजर आती हैं। 25 फरवरी को दिल्ली में फैज के जन्मदिवस पर एक समारोह का आयोजन किया जाना है।

हाशमी ने आईएएनएस से फोन पर कहा, "मैं स्वीकार करती हूं कि कुछ समय पहले तक मैं पिता की रचनाओं को अच्छी तरह से नहीं समझती थी लेकिन पिछले एक साल में मुझमें उनकी रचनाओं को लेकर बेहतर समझ पैदा हुई है। उनकी याद में हमने एक संग्रहालय 'द फैज घर' की स्थापना की है. जहां उनकी रचनाओं पर गोष्ठियों का आयोजन होता है जिससे मुझमें उनकी रचनाओं को लेकर समझ पैदा हुई है।"

"उनकी रचनाओं में कई पर्ते होती हैं और उन्हें समझना बहुत आसान नहीं होता। सभी रचनाएं किसी खास परिप्रेक्ष्य में लिखी गईं हैं लेकिन वे आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि आज भी कई राजनीतिक, सामाजिक और मानव अधिकार सम्बंधी चुनौतियां मौजूद हैं।"

वर्ष 1951 में षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तारी के बाद फैज (1911-1982) के पाकिस्तान सरकार से रिश्ते जीवन के ज्यादातर समय तक खराब रहे। उन्हें काफी समय जेल में बिताना पड़ा। इसके बाद अगले दो दशक उन्हें भारत और रूस में निर्वासन में बिताने पड़े।

सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक के शासन काल (1977-88) में उनकी ज्यादातर रचनाएं प्रतिबंधित कर दी गई थीं। प्रतिबंधित रचनाओं में 'सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे' पंक्तियों वाली 'हम देखेंगे' रचना भी शामिल थी। लेकिन तानाशाही को दरकिनार करते हुए जब प्रख्यात गजल गायिका इकबाल बानो ने जब 1985 में इसे मंच पर गाया तो 50,000 लोगों ने उनका साथ दिया।

हाशमी ने कहा, "उनकी रचनाओं में उम्मीद का संदेश है और यही संदेश लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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