प्रधानमंत्री का पर्यावरण के अनुकूल नीतियां बनाने पर जोर
'दिल्ली टिकाऊ विकास शिखर सम्मेलन' का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आर्थिक नीतियों का निर्माण करने वालों को पर्यावरण के अनुकूल कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, "इसके समाधान के दो आयाम हैं। पहला, हम नियामक नीतियों का निर्माण करे जिनसे नुकसान पहुंचाने की क्षमता वाली गतिविधियां रोकी जा सकें। हम नियामक मापदंड निर्धारित करके और उन्हें लागू करके ऐसा ही करते हैं। मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि केवल मापदंड ही पर्याप्त नहीं रहेंगे।"
प्रधानमंत्री ने कहा, "उन मापदंडों को लागू किया जाना भी जरूरी है, जो अक्सर मुश्किल होता है। यह भी देखना जरूरी है कि यह मापदंड लाइसेंस परमिट राज को बहाल न कर दें, जिनसे 90 के दशक के शुरूआती वर्षो में आर्थिक सुधारों के मद्देनजर निजात पाई गई थी।"
"दूसरा, हमें अवशिष्ट प्रदूषण से हर हाल में निपटना होगा, जो कानूनी प्रयासों के बावजूद हो रहा है। ऐसे मामलों में यह सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए कि प्रदूषण फैलाने वाले को उसका खामियाजा भुगतना होगा। इससे प्रदूषण फैलाने वाले हतोत्साहित होंगे और प्रदूषण से निपटने के लिए उठाए जाने वाले आवश्यक सुधारक कदमों के लिए धन की व्यवस्था होगी।"
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत कई क्षेत्रों विशेषकर ऊर्जा का इस्तेमाल करने वाले उद्योगों में उचित मापदंड निर्धारित करके ऐसा करने का प्रयास कर रहा है।
उन्होंने कहा कि साधारण नियम के रूप में हम सिद्धांत प्रतिरोपित करने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रदूषक को इसका खामियाजा भरना होगा, हालांकि इसे हासिल करना काफी मुश्किल है।
उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, भारत जलवायु परिवर्तन के बारे में होने वाली वार्ताओं में रचनात्मक और जिम्मेदार भूमिका निभाना चाहता है और व्यवहारिक, तथ्यात्मक लेकिन न्यायसंगत समाधान के लिए अन्य देशों के साथ मिलकर काम करना चाहता है।
उन्होंने कहा, "हमारा यह दृष्टिकोण रहा है कि जो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार हैं और वे इसकी जिम्मेदारी वहन करने की भी क्षमता रखते हैं। विकासशील देश जाहिर तौर पर कम क्षमता है और विकास की गति जारी रखने के लिए उनकी जरूरते ज्यादा हैं। टिकाऊ विकास हासिल करने के लिए इनकी सहायता की जानी चाहिए।"
प्रधानमंत्री ने कहा कि मेक्सिको में बीते साल हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में समस्या का समाधान तो नहीं हुआ लेकिन कुछ मामूली परिणाम जरूर प्राप्त हुए।
उन्होंने कहा कि 'जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र प्रारूप समझौते' (यूएनएफसीसीसी) के तहत प्रौद्योगिकी नवरचना केंद्रों के गठन के समझौते का भारत ने खासतौर पर स्वागत किया।
दिसम्बर 2010 में कानकुन में जलवायु परिवर्तन पर हुए शिखर सम्मेलन के बाद यह पहला प्रमुख सम्मेलन है। तीन दिन के इस सम्मेलन का थीम स्थानीय प्रयासों का दोहन और वैश्विक निष्क्रियता से निपटना है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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