मिस्र के आंदोलन का रुख़

जॉन सिंपसन
बीबीसी के वैश्विक मामलों के संपादक, काहिरा से
राजधानी क़ाहिरा के तहरीर चौक पर जमा होकर आंदोलनकारी मुबारक जाओ के नारे लगा रहे है.
हर क्रांति में, चाहे वो आम लोगों द्वारा शुरू की गई हो या वो किसी अन्य प्रकार की हो, एक ऐसा नाज़ुक मोड़ आता है जिसमें उस विद्रोह का भविष्य तय होता है.
ऐसे वक्त में एक सवाल खड़ा होता है: क्या आंदोलन करने वाले सत्ता में मौजूद लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा ताकतवर हैं या हुकुमत इन लोगों को झुकने पर मजबूर कर सकती है.
ईरान में सन् 1978-79 के दौरान शाह ने महीनों प्रर्दशनकारियों की कोई परवाह नहीं की थी और अपने सैनिकों को उनपर गोलियाँ चलाने का हुक्म दिया था लेकिन आख़िरकार शाह की हिम्मत जवाब दे गई और वो भाग निकले.
चीन के थियानानमन चौराहे पर 1989 में लाखों की भीड़ जमा हुई जिसमें सिर्फ़ छात्र ही नहीं बल्कि जज, उच्च पुलिस अधिकारी और राजनीतिज्ञ भी शामिल थे.
लेकिन डैंग शियोपिंग ने सत्ता नहीं छोड़ी और उन्हें सेना का एक ऐसा अधिकारी मिल गया जो भीड़ पर गोलियाँ बरसाने को तैयार था.
सभी क्रांतियों में कुछ समानताएँ होती हैं.
पहली बार जमा होते वक़्त आंदोलनकारियों को यक़ीन होता है कि वो सफ़ल होंगे क्योंकि उनके साथ इतनी बड़ी संख्या है और वो बदलाव के लिए प्रतिबद्ध हैं.
राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने कहा है कि वो अगले चुनाव के लिए नहीं खड़े होंगें
लेकिन अगर हुकुमत को सेना और गुप्तचर विभाग का सर्मथन प्राप्त हो तो वो बच जाती है.
ये इस बात पर निर्भर करता है कि सत्ता कितनी मज़बूत है और सरकारी व्यवस्था कितनी पुख़्ता है.
पूर्वी यूरोप में 1989-90 में क्रांतियों के दौरान ऐसा अनुमान लगाया गया था कि वहाँ मौजूद साम्यवादी निरंकुश हूकूमतें उग्र रुख़ अपनाएँगी.
लेकिन उसके उलट वो बहुत कमज़ोर साबित हुईं.
सन् 1991 में रूस में माक्रसवाद और लेनिनवाद के ख़िलाफ आंदोलन कर रहे विद्रोहियों को सरकार की प्रतिक्रिया का भय सता रहा था पर सोवियत हुकूमत और अधिक निर्बल थी और उसका पतन बिना किसी विरोध के ही हो गया.
टयूनिशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ैनूल आबदीन बिन अली को पहले से ही आभास था कि उनके दिन लद चुके हैं इसीलिए उन्होंने जो समेटने योग्य था, संभाला और चंपत हो लिए.
मिस्र के राष्ट्रपति अधिक कठोर हैं. उन्हें इस बात से कोई लेना देना नहीं कि कितने लोग तहरीर चौराहे पर उनके ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं.
लेकिन उन्होंने कुछ रियायतों की घोषणा करनी शुरू कर दी है.
अपने 30 साल के शासनकाल में सत्ता में किसी अन्य को जगह न देनेवाले मुबारक ने गुप्तचर विभाग के प्रमुख ऊमर सुलेमान को पिछले हफ़्ते उप-राष्ट्रपति के पद पर बैठाया है.
जनरल सुलेमान और उनके साथियों को पता है कि स्थिति ख़तरनाक है और देश में शांति तभी स्थापित होगी जब मुबारक सत्ता से हट जाएंगें.
हो सकता है कि ये सत्ता में बने रहने की उनके द्वारा तैयार की गई रुपरेखा का हिस्सा हो, लेकिन मेरे हिसाब से इसका क्रम कुछ इस प्रकार होगा:
सबसे बहले मुबारक ये घोषणा करेंगें कि वो नवंबर में होनेवाले चुनाव में नहीं खड़े होंगें जिसका अर्थ है कि वो सत्ता से अलग हो जाएंगें.
दूसरा क्रम होगा दुनियाँ भर से उठ रहे राजनीतिक बदलाव की मांग को शांत करने के लिए सियासी दलों से बातचीत.
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि मिस्र में बदलाव फ़ौरन शुरू होने चाहिएं
अमरीका ने भी मिस्र में सुव्यवस्थित बदलाव की बात कही है.
लेकिन एक दिक्क़त ये है कि तहरीर चौराहे पर मौजूद भीड़ को किसी ने ये बात नहीं बताई. उनका नारा है 'मुबारक जाओ' न कि 'मुबारक मान के साथ जाओ और सत्ता आपके तैयार किए तरीक़े से थोड़े फेरबदल के साथ चलती रहे.'
वो तख्ता पलटना चाहते हैं और मुबारक के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाना चाहते हैं.
यहाँ तो सभी को लगता है कि शुक्रवार के दिन विद्रोहियों पर गोली चलाने के आदेश उन्होंने ही दिए थे.
लोग बढ़ती क़ीमतों से लेकर पुलिस की निर्दयता के लिए मुबारक को ज़िम्मेदार मानते हैं और उनके भीतर प्रतिशोध की भावना है.
तो क्या मिस्र में उभरा लोगों का गुस्सा इस क़दर बढेगा कि देश में शासन करना असंभव हो जाएगा और मुबारक की पूरी सत्ता व्यवस्था चरमरा जाएगी?
या ये भीड़ धीरे धीरे छंट जाएगी, लोगों के भीतर इस संतोष की भावना के साथ कि चलो एक बार बात कहने का मौक़ा तो मिला?
ईरान में विद्रोहियों की जीत का कारण था कि लोगों ने हर बार जब आंदोलन में मारे गए लोगों के चालीसवें के जलूस निकाले तो पुलिस ने उनपर गोलियाँ चलाईं जिससे लोगों का गुस्सा कम होने की बजाए बढ़ता गया.
आंदोलनकारी को चीन में इसीलिए कामयाबी नहीं मिल पाई क्योंकि शियोपिंग ने वो नहीं किया जो लोग उम्मीद कर रहे थे और उसने शांति की बहाली के लिए बंदूक का सहारा लिया.
हालांकि मिस्र में सेना ने ख़ुद कह दिया है कि वो आम लोगों पर गोलियों का इस्तेमाल नहीं करेगी.
इसके अलावा एक उहाहरण पूर्वी यूरोप का है जहाँ लोगों ने आंदोलन जारी रखा और अंतत: जनता की भागीदारी रहित सरकारों का अंत हो गया.












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