केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेर-बदल, राजनीति का पुराना हथकंडा

नई दिल्ली | मई 2009 में दोबारा सत्ता में आई कांग्रेस को अपना गंदला चेहरा छिपाने के लिए अब नये चिकने-चुपड़े चेहरे उतारने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। शायद इसी बहाने वह अपने पिछले कांडों को पुराने नामों के साथ ही डिब्बाबंद करने की भूमिका बना रही है। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस जब कभी मुसीबत में फंसी उसने उन मुद्दों पर कोई आर-पार का निर्णय लेने के बजाय हमेशा उन मुद्दों को बिना खत्म किये दफनाना ही सही समझा।

देश में इस समय यूपीए सरकार के कई नाम और मंत्रालय जनता की नजर में ब्लैकलिस्टेड हो चुके हैं। सरकार काफी समय से पशोपेश में थी कि इन पर उसका स्टैंड क्या है। अचानक केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव का फैसला इस बात का स्पष्टसंकेत दे रहा है कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला समेत राष्ट्रमंजल खेल घोटाला और गोदामों में अनाज संग्रहण का गड़बड़झाला सभी को उनके ताबूतों समेत गहरे दफनाने की नई रणनीति यूपीए सरकार अपनाने जा रही है।

इन सब के बीच कुशल नेतृत्व के अभाव में साइडलाइन हुई विपक्षी पार्टी भाजपा अलग- थलग पड़ गई है। वैसे होना तो यूं चाहिए था कि भाजपा और अन्य विपक्षी दलों को इन बड़े मुद्दों पर सरकार को तब कर घेरे रखना चाहिए था जब तक वह इन घोटालों पर बड़े कदम नहीं उठा लेती। लेकिन भाजपा समेत अन्य सभी विपक्षी दल इस समय अपने ही किलों में जिंदा कफन हैं, मतलब उनके अपने ही किले अंदर ही अंदर ध्वस्त हैं तो उन्हे बाहरवालों की रणनीति समझ भी आए तो कैसे?

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