भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने खोजा हीरों जड़ा ग्रह

वाशिंगटन, 9 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारतीय मूल के अमेरिकी सौरविज्ञानी निक्कू मधुसूदन ने एक ऐसे विशालकाय ग्रह की खोज की है, जिसके गर्भ और वातावरण में कार्बन की बहुलता है। इससे इस बात की संभावना बढ़ी है कि इस ग्रह पर हीरों जड़ित सितारे मौजूद हैं।

वाराणसी स्थित प्रतिष्ठित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्र रहे मधुसूधन न्यू जर्सी के पिं्रसटन विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ पिछले साल खोजे गए एक बेहद गर्म ग्रह पर ऑक्सीजन से अधिक मात्रा में कार्बन होने का दावा किया है। यह विशेषता अब तक किसी ग्रह के अंदर नहीं देखी गई है।

विज्ञान जर्नल 'नेचर' के अनुसार वैज्ञानिकों ने बताया कि डब्ल्यूएएसपी-12बी नाम का यह ग्रह पृथ्वी से करीब 1,200 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है और यह वहीं एक तारे का चक्कर लगाता है। इसका तापमान तकरीबन 2300 डिग्री सेल्सियस है, जो इस्पात को पिघलाने के लिए काफी है।

दो वर्ष पहले कैम्ब्रिज स्थित मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्न ोलॉजी (एमआईटी) में मधुसूधन ने ग्रहों पर मौजूद वातावरण का विश्लेषण करने वाले एक कंप्यूटरीकृत प्रौद्योगिकी विकसित की थी।

प्रिंसटन विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान विभाग में पोस्ट डॉक्टरेट वैज्ञानिक मधुसूधन ने कहा कि बृहस्पति ग्रह की तरह डब्ल्यूएएसपी-12बी मुख्य तौर पर गैसों से निर्मित है लेकिन इसके गर्भ में कार्बन युक्त हीरे और ग्रेफाइट की बहुलता है।

उन्होंने कहा, "कार्बन से भरपूर नए ग्रह के आतंरिक हिस्से पर नाटकीय रूप से प्रभाव पड़ता है। हमें ग्रहों की संरचना को लेकर लम्बे समय से बनी अवधारणा पर पुनर्विचार करना चाहिए।"

डब्ल्यूएएसपी-12बी बृहस्पति ग्रह से बड़ा है। यह हमेशा धधकता रहता है। इसका तापमान इतना अधिक है कि यह एक दिन में ही अपने तारे का एक चक्कर लगा लेता है जबकि सूर्य का एक चक्कर लगाने में पृथ्वी को 365 दिन लगते हैं।

डब्ल्यूएएसपी-12बी का एक हिस्से पर सितारों का प्रकाश पड़ता है जबकि एक हिस्से में हमेशा अंधरे नजर आता है। ग्रह पर तेज हवाओं के साथ गैसीय ऊर्जा बिखरती रहती है, जो इसके दोनों हिस्सों को बराबर रूप से गर्म रखती है।

मधुसूधन ने बताया कि बेहद गर्म होने और ठोस सतह की कमी के कारण डब्ल्यूएएसपी-12बी पर जीवन संभव नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अन्य कार्बन मिश्रित ग्रहों पर जीवन संभव नहीं है।

डब्ल्यूएएसपी-12बी से निकलने वाली ऊर्जा का सबसे पहले पता वर्ष 2009 में लगा था जब वैज्ञानिकों ने अमेरिकी अंतरिक्ष केंद्र-नासा के स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कोप की मदद से इस ग्रह से निकलने वाले प्रकाश को देखा था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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