'पाकिस्तानी सेना का चरमपंथी गुटों को सहयोग'

पाकिस्तानी सेना चार बड़े चरमपंथी गुटों को गुप-चुप रूप से सहयोग देती है जिनमें अफ़गानिस्तान में तालिबान और मुंबई पर हमला करने वाले लश्कर-ए-तैबा शामिल हैं.
विकीलीक्स के ज़रिए सामने आए अमरीकी दूतावास के इस आकलन के अनुसार पाकिस्तान की ये नीति 'किसी भी क़ीमत पर बदली नहीं जा सकती'.
सितंबर 2009 में अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान के लिए अमरीकी रणनीति पर विचार व्यक्त करते हुए पाकिस्तान में अमरीकी राजदूत एन पेटरसन लिखती हैं, "पाकिस्तान को सहायता बढ़ाने के बाद भी इस बात की उम्मीद नहीं है कि वो इस चरमपंथी गुटों का साथ छोड़ दे."
अमरीका के अनुसार ये चार गुट हैं - अफ़ागनिस्तान के तालिबान, पश्चिम अफ़गानिस्तान में इसके सहयोगी हक़्क़ानी और हेकमतयार नेटवर्क, और लश्कर-ए-तैबा.
विकीलीक्स के ज़रिए सामने आए दस्तावेज़ के अनुसार पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के कुछ अधिकारी अब भी कई उग्रवादी संगठनों के साथ संबंध बनाए हुए हैं, विशेषकर तालिबान और लश्कर के साथ. अमरीकी आकलन के अनुसार पाकिस्तान अफ़ागनिस्तान में चल रहे संघर्ष में भारत की कोई भूमिका नहीं चाहता.
पाकिस्तान में अमरीकी दूतावास के अनुसार, "पाकिस्तान को डर है कि अफ़गानिस्तान में भारत की हिमायती सरकार, भारत को उसके ख़िलाफ़ अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करने देगी. ये डर सही है या नहीं ये पता नहीं लेकिन अफ़गानिस्तान में बढ़ते भारतीय निवेश की वजह से पाकिस्तान तालिबान गुटों का प्रयोग भारत के ख़िलाफ़ सहयोगी के रूप में कर रहा है. "
ये आकलन कि अमरीका का एक प्रमुख सहयोगी उसके दुश्मनों का साथ देता है, इस क्षेत्र में अमरीकी सामरिक नीति की सीमाबद्धता को दर्शाता है क्योंकि पाकिस्तान अब भी तालिबान नहीं भारत को प्रमुख ख़तरा मानता है.












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