समिति ने जज को दोषी पाया

जस्टिस सेन पर 1984 में 33 लाख रूपए के गबन का आरोप है. अदालत ने उन्हें स्टील ऑथरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड और शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के बीच उभरे विवाद में कस्टोडियन या संरक्षक नियुक्त किया था.इस पद के तहत उन्हें इस केस से जुड़ी राशि को एक अलग बैंक एकाउंट में जमा रखना था लेकिन जज के पद पर नियुक्ति के बावजूद वो राशि उनके नाम वाले एकाउंट में ही रही.
जस्टिस सेन ने स्वयं को निर्दोष बताया है और उनके वकील का कहना है कि उन्होंने कोर्ट में 58 लाख रूपए जमा कर दिए थे और उच्च अदालत ने उन्हें 2006 में बरी कर दिया था. साथ ही उनकी दलील है कि जिस घोटाले का आरोप है उनपर वो तब का है जब वो वकील थे और जज के रूप में उनकी नियुक्ति नहीं हुई थी.लेकन राज्यसभा की समिति ने बुधवार को संसद में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में उन्हें दोषी पाया है.
उप-राष्ट्रपति अंसारी ने इस समिति का गठन जस्टिस सेन के ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव पर 58 विपक्षी सांसदों के हस्ताक्षर के बाद किया था.जस्टिस सेन पर सरकारी संपत्ति की हेराफेरी का आरोप है.सांसदों का नेतृत्व मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुड़ी ने किया था.जस्टिस सेन को यदि हटाया जाता है तो वो देश के पहले न्यायाधीश होंगे जो महाभियोग के ज़रिए हटाए जाएंगे.
अभी तक कोई राजनीतिक पार्टी उनके समर्थन में नहीं आई है लेकिन सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने अभीतक अपना रूख़ स्पष्ट नहीं किया है.समिति की रिपोर्ट के बाद सीताराम येचुड़ी ने कहा है कि वो अब फिर नए सिरे से इस महाभियोग प्रस्ताव को राज्यसभा में पेश करेंगे और यदि बहस के बाद ये पारित हो जाता है तो फिर इसे लोकसभा में पेश किया जाएगा.दोनों सदनों में इसे उस समय वहां मौजूद सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से पारित होना होगा जिसके बाद ही ये राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए जाएगा. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ही उन्हें हटाया जा सकता है.












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