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छठ विशेष : सूर्य की पूजा से पूरी होती है मुरादें

पटना। लोक आस्था के महापर्व छठ का हिंदू धर्म में अलग महत्व है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें ना केवल उदयाचल सूर्य की पूजा की जाती है बल्कि अस्ताचलगामी सूर्य को भी पूजा जाता है। छठ पूजा के लिए प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित ऐतिहासिक त्रेतायुगीन पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर पहुंचते हैं।

यह मंदिर सदियों से देशी-विदेशी पर्यटकों, करोड़ों श्रद्धालुओं और छठ व्रतियों की अटूट आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर की अद्भुत स्थापत्य कला, कलात्मक भव्यता के कारण किंवदंति है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों से एक रात में किया था। इस मंदिर के निर्माण काल के विषय में सही जानकारी किसी के पास नहीं है।

सूर्य की पूजा से पूरी होती है मुरादें

मंदिर के बाहर लगे शिलापट्ट पर ब्रह्मी लिपि में लिखित और संस्कृत में अनुवादित एक श्लोक के मुताबिक 12 लाख 16 हजार वर्ष के त्रेता युग के बीत जाने के बाद इलापुत्र पुरुलवा ऐल ने इस देव सूर्य मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ करवाया था। शिला लेख से स्पष्ट होता है कि इस मंदिर के निर्माण काल का एक लाख 50 हजार 10 वर्ष हो चुके हैं।

देश के एकमात्र पश्चिमाभिमुख सूर्य मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल (प्रात:), मध्याचल (दोपहर) और अस्ताचल (अस्त होते) के रूप में विद्यमान है। जिस तरह उड़ीसा राज्य के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर का शिल्प है ठीक उसी से मिलता-जुलता शिल्प देव का प्राचीन सूर्य मंदिर का भी है।

करीब 100 फुट ऊंचे इस मंदिर का निर्माण बिना सीमेंट अथवा चूना-गारा का प्रयोग किए आयताकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार वर्गाकार आदि कई रूपों में पत्थरों को काटकर किया गया है। इस मंदिर के सबसे ऊपर सोने का एक कलश है। किवंदती है कि काफी प्राचीन समय में इस सोने के कलश को कोई चोर चुराने गया था तो वह वहीं चिपककर रह गया।

प्रतिवर्ष चैत्र तथा कार्तिक में होने वाले छठ पर्व में यहां लाखों श्रद्धालु छठ करने के लिए जुटते हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी सच्चिदानंद पाठक ने आईएएनएस को बताया कि इस मंदिर के निर्माण का ठोस प्रमाण तो नहीं मिलता है परंतु सूर्य पुराण के अनुसार ऐल एक राजा थे जो किसी ऋषि के शाप के चलते कुष्ठ से पीड़ित थे।

वह एक बार शिकार करते हुए देव के वनप्रांत में पहुंचे और रास्ता भटक गए। इस दौरान उन्हें बहुत जोर की प्यास लगी। उन्होंने वहां एक छोटा सरोवर देख पानी पीया और उनका कुष्ठ ठीक हो गया। आज भी वह सरोवर वहां मौजूद है, जहां लोग नहाने आते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे तो प्रत्येक दिन यहां हजारों लोग पूजा के लिए आते हैं परंतु छठ के दौरान यहां लाखों में भीड़ जुटती है।

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