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जातिवाद से दूर होती बिहार की राजनीति!

Nitish Kumar Lallu Yadav
बिहार चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। 243 सीटों के मद्देनजर गुरूवार को प्रथम चरण के लिए मतदान डालें जायेंगे। सत्ता पर कौन आसीन होगा ये तो कुछ वक्त के बाद ही पता चल जायेगा। लेकिन हर पार्टी ने अपनी तरफ से पुर जोर कोशिश कर डाली है। जरा बिहार के राजनैतिक समीकरण पर गौर फरमायें तो आज का बिहार चुनाव पिछले की चुनावों से काफी बदला हुआ है। देश की मौलिक जरूरत रोटी, कपड़ा और मकान है लेकिन चुनाव हमेशा जातिवाद के मुद्दे पर लड़े जाते हैं, पार्टी उसी की सत्ताआसीन होती है जिसे जातिविशेष का स्नेह प्राप्त होता है। अब वो जातिवर्ग चाहे सवर्ण की हो या फिर दलितों की।

ज्यादा दूर नहीं जाते हैं, यूपी का विधानसभा चुनाव याद करते हैं जो आज से 15 साल पहले हुआ था जहां पहली बार सत्ता का स्वाद चखा था यूपी में समाजवाद का पाठ पढ़ाने वाले मुलायम सिंह यादव ने, जिन्होंने राजनीति को ठाकुरों-पंडितो के गलियारे से निकालकर पिछड़ी और दलित जातियों के झोपड़ो तक पहुंचाकर एक नए सियासी चेहरे का गठन किया था , जिसे बाद में मौजुदा मुख्यमंत्री मायावती ने बहुत भूनाया और नतीजा आपके सामने हैं, मायावती को पूर्ण बहुमत मिला और तीन बार राज्य का सीएम बनने का गौरव प्रदान हुआ। इसी जातिवाद को मुलायम, लालू और पासवान ने लोकसभा चुनाव में भी भूनाने की कोशिश की लेकिन अफसोस जनता ने उनका साथ नहीं दिया। राजद-लोजपा दोनों को लोकसभा चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। पासवान का तो खाता तक नहीं खुला।

वही सरगर्मियां आज भी बिहार में दिखायी पड़ रही है, आज बिहार का चुनावी मु्द्दा जातिवाद न होकर विकास हो गया है। तभी तो राजद प्रमुख लालू आज अपनी चुनावी जन सभाओं में जाति को मु्द्दा न बनाते हुए जनता से अपने पिछली गलतियों की माफी मांगते दिखायी पड़ते है, नीतीश को अयोग्य और खुद को योग्य साबित करने में जुटे लालू समझ चुके हैं कि आज की जनता केवल तरक्की चाहती है, उसे रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए और वो उसी की होगी जो उसे यो तीनों चीजें मुहैया करवायेगा।

कुछ ऐसा ही हाल कांग्रेस का है, जिसे देश और राज्य की यथा स्थिति अच्छी तरह से वाकिफ है, लोकसभा चुनाव में पंजे की आश्चर्यजनक सफलता के पीछे बहुत बड़ा कारण राहुल गांधी थे जिन्होंने अपनी रैलियों में चिल्ला चिल्ला कर देश की युवाशक्ती और विकास का मु्द्दा उठाया था। कांग्रेस जानती है कि बिहार पिछले 15 सालों में किन अभावों से जूझ रहा था। इसलिए उसकी रैलियां शांत है, वो न तो किसी की बुराई कर रही है और न ही किसी का गुणगान, उसके पास केवल युवा मु्द्दा है जो उसे अपनी बिहार में खोई हुई पहचान दिला सकता है, उसे भी पता है कि ठाकुर-पंडित की लड़ाई में उसके हाथ कुछ नहीं आयेगा।

जबकि बात अगर कमल की करें तो वो पूरी तरह से अपनी खोई हुई शाख को बचाने में जुटा है, भाजपा जान चुकी है कि अगर उसे बिहार में खिलना है तो उसे जातिवाद के कीचड़ से निकल कर विकास और तरक्की के तालाब में जाना पड़ेगा। इसलिए तमाम विरोध और मनमुटाव के बाद भी नीतीश का साथ दे रही है। कुल मिलाकर सार इतना है कि कभी जातिवाद को अपना ब्रह्मास्त्र मानने वाली राजनैतिक पार्टियां आज उसे भूलकर विकास के नाम पर लोगों से वोट मांगने चलीं है, क्योंकि वो समझ चुकी है कि अगर कुर्सी पर बैठना है तो जनता का पेट भरना होगा न कि जाति विशेष को तवज्जों देकर उन्हें सत्ता में लाना।

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