सड़क नापने के सुख

सड़क नापने के सुख
योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए विशेष

"उत्तर प्रदेश अब बिहार जैसा बनता जा रहा है और बिहार उत्तर प्रदेश से भी बेहतर.." ट्रेन अभी दिल्ली से चली ही थी कि बिहार की विचार यात्रा शुरु हो गई थी. मिर्ज़ापुर के एक उद्योगपति-राजनेता-ठेकेदार एक ही वाक्य में मायावती और नीतीश कुमार सरकार पर क्रमश: अविश्वास और विश्वास प्रस्ताव पेश कर रहे थे. मांगने पर उन्होंने एक शब्द में प्रमाण दिया - "सड़क."

क्षण भर के लिए लगा कि ये एक ठेकेदार की राष्ट्रनिर्माण के प्रति टेंडरमयी दृष्टि का नमूना है. राष्ट्र निर्माण यानि पुल-बांध, बिल्डिंग और सड़कों का निर्माण. इस ख़याल की गुदगुदी से बाहर निकला तो उनकी चुनौती सुनाई पड़ी - "आप वहां जा रहे हैं, अपनी आंखों से देख लीजिएगा."

ख़ुद अपनी आंख से देखने, जांचने और परखने की अनिवार्यता ही तो मुझे एक बार फिर बिहार खींचे लिए जा रही थी. बिहार में विकास के दावों और प्रतिदावों को महज आंकड़ों या फिर अख़बारी रपट के आधार पर जांचा नहीं जा सकता. यहां आंख से देखने का कोई विकल्प नहीं है. क्या ये तर्क मन बहलाने की कोशिश है? लोकतंत्र के इस तीर्थ में एक बार फिर डुबकी लगाने का बहाना मात्र है?

सड़कों में सुधार लेकिन जयपुर या भोपाल जैसा नहीं. जो भी हो, सड़क नापने का कोई विकल्प तो था नहीं. पटना स्टेशन पर उतरते ही एक आंख सड़क पर गड़ा दी. शहर की सड़कें पहले से बेहतर थीं, लेकिन प्रचार की तुलना में और जयपुर या फिर भोपाल के मुक़ाबले साधारण ही कहलाएंगी. यूं भी असली परीक्षा तो राजधानी से बाहर निकलने पर ही शुरु होगी.

शायद मेरे मन के किसी कोने में आठ बरस पहले बिहार की एक और यात्रा की स्मृति जीवित थी. मुज़फ़्फ़रपुर से सीतामढ़ी के बीच 57 किलोमीटर का फ़ासला तय करने में सात घंटे लगे थे. पहले बस में यात्रा, फिर जाम में फंसी बस में यंत्रणा. किसी तरह टैम्पो में लदकर जाम के उदगम तक का सफ़र. फिर नौका से बाढ़ का पानी पार..पानी के किनारे से ठेलेनुमा-रिक्शे में सामान रख पैदल मार्च. अंतत: एक और बस में रेंगते, घिसटते गंतव्य की प्राप्ति.

अब पटना से बाहर निकल सड़क नापते तीन दिन हो चुके हैं, गाड़ी राष्ट्रीय राजमार्गों पर चल चुकी है, बिहार के राजमार्गों पर दौड़ चुकी है. अंदरूनी इलाक़ों की छोटी सड़कों पर चल चुकी है, खड़ंजों और कच्चे रास्तों पर धूल फांक चुकी है. गाड़ी साबुत है और सवारियां सलामत.

कभी-कभार पुराने किस्म की गड्ढानुमा सड़कों की झलक भी मिल जाती है, लेकिन कुछ ही दूरी के लिए. पंजाब हरियाणा या दक्षिण भारत की तुलना में आज भी बिहार की सड़कें उन्नीस ही लगतीं हैं.

लेकिन अगर तुलना पांच साल पहले के बिहार से करें तो निस्संदेह कायापलट हो चुका है. नीतीश कुमार सरकार ने साबित कर दिखाया है कि राजनैतिक इच्छा शक्ति और प्रशासनिक चुस्ती से असंभव लगने वाले काम को भी सरअंजाम दिया सकता है. इस सच को नीतीश सरकार के घोर आलोचक भी दबी ज़ुबान में मानते हैं. वो इतना ज़रुर कहते हैं कि सड़क बनाने का सारा पैसा केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री योजना से आया.

लेकिन आम जनता को इन बारीकियों से क्या मतलब? कभी तैश में आकर ये भी कहतें है कि जिसके पास कार नहीं है वो सड़क को क्या चाटेगा? लेकिन आम वोटर इस कुतर्क से प्रभावित नहीं होता, उसके लिए सड़क का मतलब है शिक्षा और रोज़गार के बेहतर अवसर, तीज-त्योहार पर रिश्तेदारों से मिलने की सुविधा और इमरजेंसी में अस्पताल पहुंच जान बचाने की संभावना.

सड़कें तो बनीं लेकिन क्या सड़क ही विकास है? क्या सड़क का पुण्य वोटों की शक्ल ले पाएगा? इन सब सवालों को मन में रख फिर बिहार और उत्तर प्रदेश की तुलना कर रहा था. तभी मायावती की चुनावी रैली की रपट पर नज़र पड़ी.रपट के मुताबिक मायावती बिहार में उत्तर प्रदेश जैसा विकास लाने का वादा किया है. सोचने लगा कि ये बिहार में आशा जगाएगा या आशंका?

(जानेमाने राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव बिहार चुनाव का जायज़ा लेने के लिए वहाँ के दौरे पर हैं. वह समय-समय पर बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के पाठकों से अपने अनुभव बांटते रहेंगे. पढ़िए उनकी डायरी का यह पहला पन्ना. )

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