कर्नाटक की सियासी जंग में लोकतंत्र शर्मसार

BS Yeddyurappa
बेंगलुरू। कर्नाटक का राजनीतिक भूकंप राज्य में कहर बरपाने के बाद अब निबटारे की आस में राजधानी दिल्ली के गलियारों में डोल रहा है। येन-केन प्रकारेण मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने सोमवार को विधानसभा में विश्वास मत तो हासिल कर लिया लेकिन अस्थिरता का प्रेत अभी भी उनका पीछा कर रहा है।

राज्यपाल या कांग्रेस के नुमाइंदे

कर्नाटक की राजनीति में कुछ तत्व अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से भी अधिक सक्रिय हैं। इनमें से राज्य के राज्यपाल का नाम अग्रणी है। राज्यपाल हंसराज भारद्वाज की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सर्वाधिक संदिग्ध और विवादास्पद रही है। लेकिन वे अभी भी कांग्रेस के सच्चे कार्यकर्ता के बतौर काम करने में लगे हुए हैं। इसी क्रम में उन्होने एक बार फिर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश की है।

सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा , "सदस्यों को अयोग्य ठहराए जाने की प्रक्रिया अनैतिक थी।" राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने रविवार को विधानसभा अध्यक्ष को बागी विधायकों को अयोग्य करार नहीं देने की सलाह दी थी। बोपैया ने राज्यपाल की सलाह के विपरीत कदम उठाते हुए विधायकों को मतदान से वंचित कर दिया।

विधानसभा अध्यक्ष या भाजपा के पैरोकार

रिपोर्ट में विधानसभा में ध्वनि मत से विश्वास प्रस्ताव पारित कराने और विधानसभा अध्यक्ष केजी बोपैया के व्यवहार को केंद्र में रखा गया है। विधानसभा के एक अधिकारी ने बताया, "मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने ध्वनि मत से सदन पटल पर बहुमत साबित कर दिया। राज्यपाल के निर्देश पर विधानसभा अध्यक्ष केजी बोपैया ने सुबह 10 बजे कार्यवाही शुरू की। इसके बाद सत्ता पक्ष के 106 विधायकों ने 'हां' कहा।"

इससे पहले, विधानसभा अध्यक्ष केजी बोपैया ने 16 बागी विधायकों को अयोग्य करार कर दिया। बोपैया ने आठ अक्टूबर को इन सभी बागियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था और रविवार शाम पांच बजे तक जवाब मांगा था। इनमें 11 सत्ताधारी भाजपा से हैं जबकि पांच निर्दलीय हैं। विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने से सदन में कुल विधायकों की संख्या 225 से घटकर 208 हो गई। ऐसे में बहुमत साबित करने के लिए कुल 105 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। एक विधायक एंग्लो-इंडियन समुदाय का होता है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय करेगा फैसला

वहीं दूसरी ओर, विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य करार दिए गए विधायकों ने उनके फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका पर सुनवाई मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी। अदालत ने अभियोजन व बचाव पक्ष की ओर से जारी बहस दिन की समाप्ति तक पूरा न हो पाने के बाद सुनवाई स्थगित कर दी।

भाजपा के 11 विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने के बाद सदन में पार्टी विधायकों की संख्या घटकर 106 हो गई। इसमें विधानसभा अध्यक्ष भी शामिल हैं। इसके बाद कांग्रेस के 73 और जद (एस) के 28 विधायक हैं। छह विधायक निर्दलीय हैं। ध्वनि मत से प्रस्ताव जीतने की घोषणा करते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी और सदन से बाहर चले गए। हालांकि कांग्रेस व जनता दल (सेक्युलर) के विधायक सदन में आसन के सामने विश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया को लेकर विरोध जताते रहे

जेडी(एस) का पक्ष

जेडी (एस) के नेता एच. डी. कुमारस्वामी ने कहा कि उनकी पार्टी राज्यपाल हंसराज भारद्वाज से मिलकर भाजपा सरकार को बर्खास्त करने की मांग करेगी। कुमारस्वामी ने पत्रकारों से कहा, "हम सरकार की तुरंत बर्खास्तगी की मांग करते हैं। विश्वास प्रस्ताव पर सही तरीका नहीं अपनाया गया। ध्वनि मत की घोषणा करने के बाद विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री सदन से फौरन बाहर चले गए।

कांग्रेस का पक्ष

इस बीच, कांग्रेस ने कहा कि कर्नाटक में लोकतंत्र और संविधान की हत्या हुई है और राज्यपाल द्वारा रिपोर्ट भेजे जाने के बाद वह अपनी रणनीति तय करेगी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने यहां कहा, "कर्नाटक में जो कुछ हुआ, वह न केवल लोकतंत्र की पूर्ण रूप से हत्या है, बल्कि देश में संविधान की हत्या भी। एक अल्पमत सरकार विधानसभा अध्यक्ष की कपटपूर्ण व जोड़तोड़ की कार्रवाई के जरिए बहुमत में बदल दी गई।"

भाजपा का पक्ष

इस बीच, भाजपा ने मंगलवार को अपने 105 विधायकों की राष्ट्रपति के समक्ष परेड कराने की घोषणा की है। कुल मिलाकर कर्नाटक की राजनीतिक उठापटक अब दिल्ली के दरवाजों पर सिर पटक रही है। इधर, भाजपा के वरिष्ठ नेता एम वेंकैया नायडू ने कांग्रेस और जेडी (एस) पर 'गंदी चालें' चलने का आरोप लगाते हुए कहा कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल था जिस कारण उन्होंने विधानसभा में बहुमत साबित कर दिया।

भाजपा सरकार के विश्वास मत जीतने पर संतोष जाहिर करते हुए भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने इसे लोकतंत्र की जीत करार दिया और कहा, "कांग्रेस और जेडी (एस) ने भाजपा सरकार को अस्थिर करने की कोशिशें की।" येदियुरप्पा से बगावत करने वाले विधायकों के भविष्य के बारे में पूछे जाने पर गडकरी ने कहा कि उन्होंने पार्टी के साथ विश्वासघात किया। गडकरी ने कहा, "वे बिक गए थे। उन्होंने पार्टी के साथ धोखा किया.. उन्हें निकाल बाहर कर दिया गया।"

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