अयोध्या फ़ैसले पर बुद्धिजीवियों का बयान

अयोध्या फ़ैसले पर बुद्धिजीवियों का बयान

अयोध्या के फ़ैसले के बाद देश के हर वर्ग ने अपनी अपनी प्रतिक्रिया अपने अपने तरीके से ज़ाहिर की है.

देश का बुद्धिजीवी वर्ग मानता है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर 30 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो फ़ैसला आया है, वो कई सवाल खड़े करता है.

बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस फ़ैसले में जिस तरह से इतिहास, तर्क और दलीलों और धर्मनिरपेक्ष विचारधाराओं से निपटा गया है, ये गंभीर चिंता का विषय है.

एक बयान जारी कर इन लोगों ने कहा है कि "फ़ैसले में कई ऐसे साक्ष्यों का ज़िक्र नहीं है जो इस फ़ैसले के विरोध में अदालत में पेश किए गए थे."

देश के नामचीन इतिहासकारों और दूसरे बुद्धिजीवियों ने ये बयान जारी किया है, उसमें रोमिला थापर, केएम श्रिमाली, डीएन झा, शिरीन मूसवी, इरफ़ान हबीब, ज़ोया हसन, प्रभात पटनायक और जयती घोष समेत कुल 61 लोग शामिल हैं.

इस बयान में कहा गया है कि इस फ़ैसले में तीन में से दो जजों ने ये कहा है कि बाबरी मस्जिद एक हिंदू ढांचे के गिरने के बाद बनाई गई. लेकिन इनका कहना है कि इस मत के विरोध में भारतीय पुरातत्त्व विभाग (एएसआई) ने जो सभी साक्ष्य प्रस्तुत किए, उन्हें दरकिनार कर दिया गया है.

इन बुद्धिजीवियों का कहना है कि ये साक्ष्य एएसआई की अपनी ही खुदाई में पाए गए थे.

बुद्धिजीवियों का कहना है कि खुदाई में जो जानवरों की हड्डियाँ और इमारत तैयार करने में इस्तेमाल होनेवाली सुर्ख़ी और चूना मिला है, उससे मुसलमानों की उपस्थिति साबित होती है. इससे ये भी साबित होता है कि वहाँ मस्जिद से पहले मंदिर था ही नहीं.

बयान में कहा गया है कि एएसआई की वो विवादित रिपोर्ट जो ऊपर व्यक्त किए गए मत से भिन्न पक्ष प्रस्तुत करती है, और जिस पक्ष का आधार उन खंभों को बताया गया है जिसके बारे में कहा गया कि वो खंभे खुदाई में मिले और वो अवशेष में मौजूद थे, स्पष्ट तौर पर चालबाज़ी है क्योंकि खंभे कभी मिले ही नहीं थे.

इन खंभों की कथित मौजूदगी का मुद्दा पुरातत्त्ववेत्ताओं के बीच भी वाद-विवाद का विषय रही है.

इन बुद्धिजीवियों ने माँग की है कि विवादित स्थल से जुड़े नोटबुक, प्रचीन कलाकृतियाँ और दूसरे साक्ष्य जो एएसआई की खुदाई में मिले हैं, वो देश के इतिहासकारों पुरातत्त्ववेत्ताओं और विषय के जानकारों को सौंपे जाएँ जिससे की उनकी जाँच की जा सके.

बयान में कहा गया है कि "हिंदुओं की इस कथित मान्यता के विषय में भी कि आदिकाल से भगवान राम की जन्मस्थली वही है जहाँ मस्जिद थी, कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए हैं."

इन बुद्धिजीवियों का कहना है कि इस मान्यता के इतने पुराने होने को मानना जहाँ फ़ैसले की एक ग़लत बात है, वहीं दूसरी तरफ़ ये भी गलत है कि संपत्ति के मालिकाना हक़ में मान्यता को दलील मानकर, उस आधार पर फ़ैसले किए जाएँ.ये क़ानून और निष्पक्षता के सभी सिद्धांत के ख़िलाफ़ है.

बयान में कहा गया है कि "इस फ़ैसले में सबसे आपत्तिजनक बात ये है कि ये हिंसा और बाहुबल को क़ानूनी मान्यता देता है."

बयान के मुताबिक ये फ़ैसला जहाँ 1949 में मस्जिद के गुंबद के नीचे ज़बरदस्ती घुसकर मूर्त्तियों को रखने को सही ठहराता है, वहीं बिना किसी तर्क के अब ये मान चुका है कि मूर्त्तियों को उनके सही स्थान पर रखा गया है.

इस बयान में ये भी कहा गया है कि इस फ़ैसले की और भी चौंकानेवाली बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की ही अवमानना करके ये 1992 में मस्जिद को ढाए जाने को एक ऐसी हरकत के तौर पर स्वीकार करता है जिसके परिणाम, उन लोगों को मस्जिद का मुख्य हिस्सा मंदिर बनाए जाने के लिए देकर मान लेने चाहिए जो ऐसा ही करने के लिए अबतक लड़ रहे थे.

बुद्धिजीवियों ने कहा है कि "इन्हीं कारणों से हम मानते हैं कि इस फ़ैसले से देश की धर्मनिरपेक्ष छवि और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचा है."

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