अयोध्या: कब क्या हुआ?

Ayodhya

रामदत्त त्रिपाठी, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

सरयू के तट पर अयोध्या के राम कोट मोहल्ले में सोलहवीं शताब्दी में बनी मस्जिद और राम जन्मभूमि को लेकर यूँ तो सदियों से विवाद चला आ रहा है. लेकिन रामजन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद की लंबी कानूनी लड़ाई का दौर भारत के आज़ाद होने के बाद दिसंबर १९४९ में शुरू हुआ.

पुलिस ने एक मुक़दमा कायम किया कि मस्जिद के अंदर चोरी-छिपे भगवान राम की मूर्तियाँ रखकर उसे कथित तौर पर नापाक कर दिया गया. तत्कालीन अतिरिक्त सिटी मजिस्ट्रेट मार्कंडेय सिंह ने शांति भंग के अंदेशे में दंड प्रक्रिया संहित की धारा 145 में मस्जिद की इमारत को विवादग्रस्त घोषित कर कुर्क कर लिया.

तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष बाबू प्रियदत्त राम को क़ानूनी रिसीवर नियुक्त कर मूर्तियों की पूजा भोग आदि का जिम्मा सौंपा.

इस घटना से लखनऊ में गोविंद वल्लभ पंत से लेकर दिल्ली में जवाहर लाल नेहरु की सरकारें चिंतित हो गईं. मूर्तियां हटाने की बातें हुईं मगर तभी गोपाल सिंह विशारद की याचिका पर स्थानीय सिविल कोर्ट ने मूर्तियां हटाने पर रोक लगा दी और कोर्ट के रिसीवर के ज़रिये पूजा दर्शन और भोग की व्यवस्था जारी रखी.

एक ऐसा ही मुक़दमा महंत राम चंद्र परमहंस ने दायर किया. 1955 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इसकी पुष्टि कर दी. फिर 1959 में सनातन हिंदुओं की ओर से निर्मोही अखाड़ा ने रिसीवर हटाने और विवादित इमारत को राम मंदिर बताते हुए कब्ज़ा सौंपने का मुक़दमा दायर किया.

दो साल बाद सुन्नी मुस्लिम सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने विवादित इमारत को मस्जिद घोषित करते हुए कब्ज़ा देने की मांग की. ज़िला अदालत ने इसे लीडिंग केस मानते हुए चारों मुक़दमों को इकट्ठा कर दिया और दोनों समुदायों की अन्य संस्थाओं को मुक़दमे में पक्षकार बनने की अनुमति दी. छह दिसंबर, 1992 को हिंदू कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था

अगले बीस सालों तक यह मुक़दमा गुमनामी में खो गया.

लेकिन वर्ष 1984 में राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति ने विवादित इमारत का ताला खोलने का अभियान चलाकर इसे सुर्ख़ियों में ला दिया. 1986 में ज़िला जज के एकतरफ़ा आदेश पर विवादित इमारत का ताला खुलने पर हिंदू गुटों ने जश्न मनाया जिसकी प्रतिक्रया में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन हुआ और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी मामले में दिलचस्पी लेना शरू किया.

वर्ष 1989 में आम चुनाव से पहले विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर के शिलान्यास की मुहिम शुरू की. मस्जिद से दो सौ फुट दूर शिलान्यास हो भी गया.

शिलान्यास से पहले हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने चारों सिविल मामले अपने पास ट्रांसफर कर लिए.

इसी समय विश्व परिषद की ओर से एक नया मुक़दमा कायम हुआ और शंकाराचार्य स्वरूपानंद की राम जन्म भूमि पुनरुद्धार समिति भी मुक़दमेबाज़ी में शामिल हो गई.

बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद वहाँ आनन फ़ानन से एक अस्थाई मंदिर बना दिया गया और मूर्तियाँ रख दी गईं

इसके बाद दिल्ली और लखनऊ दोनों में तख्ता पलट हुआ. दिल्ली में वीपी सिंह और लखनऊ में मुलायम के गद्दी पर रहते भापजा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की.

आडवाणी को बिहार में लालू यादव की सरकार ने गिरफ़्तार कर लिया. 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों ने मस्जिद पर धावा बोला, लेकिन पुलिस ने गोलियाँ चलाकर मस्जिद को बचा लिया.

वीपी सिंह और उनके बाद प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने बातचीत से मामला हल करने की नाकाम कोशिश की.

छह दिसंबर 1992 को लखनऊ में भापजा के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और दिल्ली में कांग्रेस के पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे जब विवादित मस्जिद धराशायी कर दी गई.

इसके बाद केंद्र सरकार ने मस्जिद, उसके बगल में राम चबूतरे और कई मंदिरों और धर्मशालाओं समेत लगभग 70 एकड़ ज़मीन इस उद्देश्य से अधिग्रहित कर ली कि वहाँ मंदिर और मस्जिद दोनों बन सकें.

इसी क़ानून के ज़रिये चारों मुक़दमे समाप्त करके सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी कि क्या वहाँ कोई पुराना हिंदू मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में जमीन अधिग्रहण को वैध ठहराते हुए भी उसमें मुक़दमा समाप्त करने का प्रावधान रद्द कर दिया और मामलों को निर्णय के लिए हाईकोर्ट भेज दिया ताकि अपील करने का वैधानिक अधिकार न मारा जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सारे मुक़दमों का आख़िरी फैसला होने तक सारी ज़मीन केंद्र सरकार के कब्ज़े और सुरक्षाबलों के पहरे में रहेगी.

प्रेक्षक मानते हैं कि यह मामला भारतीय समाज और धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक-लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए चुनौती तो है ही , देश का भविष्य भी इस पर निर्भर करता कि यह विवाद आगे क्या स्वरुप लेता है.

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