किसी भी अप्रिय घटना की ज़िम्मेदारी केंद्र पर: मायावती

Ayodhya Security
गृह मंत्रालय ने 16 स्थानों की अतिसंवेदनशील के रूप में पहचान की है. इसी तरह 32 शहरों को संवेदनशील बताया गया है. राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला गुरुवार 30 सितंबर को सुनाया जा रहा है.

फ़ैसले के मद्देनज़र देशभर में लोग सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबंद होने की उम्मीद कर रहे लेकिन उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा है कि केंद्र सरकार ने राज्य में सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मियों की उनकी मांग को गंभीरता से नहीं लिया और ऐसे में किसी भी अप्रिय घटना की ज़िम्मेदारी पूरी तरह केंद्र सरकार पर होगी.

राज्य के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने मीडिया के सामने मुख्यमंत्री का वकतव्य पढ़ते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने लिखित तौर पर दो बार प्रधानमंत्री से केंद्रीय सुरक्षाबल की 642 टुकड़ियां उपलब्ध कराए जाने के लिए कहा. मायावती का कहना है कि उन्हें केवल 52 टुकड़ियां उपलब्ध कराई गई हैं.

उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम के इस दावे को भी खारिज किया कि उत्तर प्रदेश में 1,90,000 पुलिसकर्मी तैनात हैं. मुख्यमंत्री ने कहा है कि 2007 में चुनावों के दौरान निष्पक्षता और स्थिति पर नियंत्रण रखने के लिए अर्धसैनिक बलों की 700 टुकड़ियां उपलबिध कराई थीं.

अयोध्या फ़ैसले के मद्देनज़र बुधवार को देशभर में सुरक्षा इंतज़ाम पर संतुष्टि जताते हुए भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि भारत अब 1992 के मुक़ाबले काफ़ी आगे बढ़ चुका है.

भारत आगे बढ़ चुका है:चिदंबरम

चिदंबरम ने कहा कि 1992 के बाद पैदा हुए भारतीयों का विश्व नज़रिया अलग हैं. उनका कहना था, "इस पीढ़ी के लिए भारत एक बहुत बड़ी और अलग कहानी है और वो इस तरह की घटनाओं से उस कहानी का रूख बदलता नहीं देखना चाहते."

गृहमंत्री ने क़ानून व्यवस्था के प्रति पूरा विश्वास जताते हुए कहा कि ज़्यादातर लोगों ने कहा है कि वो अदालत के फ़ैसले का सम्मान करेंगे और उसके बाद का कोई भी कदम उठाने के लिए क़ानून का रास्ता चुनेंगे. फ़ैसले से तनाव फैलने की आशंका को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि वे संवेदनशील स्थानों में सुरक्षा व्यवस्था का ख़ास ध्यान दें.

हाईकोर्ट के फ़ैसले को लेकर हाई अलर्ट

गृह मंत्रालय ने 16 स्थानों की अतिसंवेदनशील के रूप में पहचान की है. इसी तरह 32 शहरों को संवेदनशील बताया गया है. पिछले 60 सालों में विवादित परिसर का भूगोल बिलकुल बदल गया है.

इस महत्वपूर्ण फ़ैसले के तहत अदालत को मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर फै़सला देना है कि क्या विवादित स्थल भगवान राम की जन्म भूमि है, क्या सन 1527 में कोई पुराना मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी और क्या इस्लामी का़नून के मुताबिक़ वो मस्जिद जायज़ है. क्या सन 1949, 22-23 दिसंबर को मस्जिद के अंदर चोरी छिपे मूर्तियां रख दी गई थीं अथवा वहां हमेशा से मूर्तियों की पूजा होती रही है?

कुछ तकनीकी बिंदुओं पर भी अदालत को निर्णय देना है. मसलन क्या ये मुकदमे निर्धारित समय सीमा में दायर किए गए, क्या मुकदमा करने वालों ने सरकार को ज़रुरी नोटिस वगै़रह दिए थे और क्या इस मामले में उन्हें मुकदमा दायर करने का का़नूनी अधिकार था?

अयोध्या: क्या हैं विवाद के मुद्दे

हाईकोर्ट 1979 से इस मुक़दमे को ज़िला अदालत से अपने पास मंगाकर सिविल कोर्ट के रूप में सुनवाई कर रही है. हाईकोर्ट के फै़सले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील हो सकेगी. पक्षकार चाहें तो आपसी बातचीत भी शुरू कर सकते हैं.

पिछले 60 सालों में विवादित परिसर का भूगोल बिलकुल बदल गया है. विवादित मस्जिद छह दिसंबर 1992 को उग्र कारसेवकों द्वारा तोड़ दी गयी थी. इसके बाद केंद्र सरकार ने आसपास के मंदिरों आदि की जमीनों को मिलकर लगभग 70 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली थी , जिससे मूल विवाद पर अदालत का फ़ैसला लागू करने में आसानी हो.

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