अयोध्या फ़ैसले का भारत को इंतज़ार

दोपहर को फैज़ाबाद में दाख़िल होते ही कुछ भी ऐसा नहीं लगा जिसे देख कर कहा जा सकता हो की 24 सितम्बर को रामजन्म भूमि- बाबरी मस्जिद विवाद पर फ़ैसला आने वाला है.
शहर का मंज़र वही जो डेढ़ साल पहले देखा था. दाख़िल होते ही बस अड्डे पर वही रोडवेज़ बसों का हुजूम, संकरी सड़कों पर गाड़ियों से ज़्यादा दौड़ रहे दो पहिया वाहन और उनसे भी ज़्यादा फर्राटे से दौड़ रहे साइकल रिक्शा.
हमारा होटल शहर के बीचोबीच है सो माहौल ज़्यादा बेहतर दिखता है. होटल के सामने वाली अंग्रेजी और देशी शराब की दुकान पर पहले से ज़्यादा ही भीड़ और पास खड़े ठेलों पर झुण्ड में आलू टिकिया और पानी के बताशे खा रहे लोग. पर एक बात है जो हर किसी के ज़हन में है. 24 सितम्बर को न्यायालय आख़िर फ़ैसला किसके पक्ष में देगा.
हिन्दुओं के या मुसलमानों के. इस क़यास से थोड़े विचलित हो कर आगे बढ़े ही थे कि एक के बाद एक दो झांकियां देखने को मिली. ये है फैज़ाबाद शहर में पिछले एक दशक से व्यापक तौर पर शुरू हुई गणेश विसर्जन की प्रथा.
शहर में इंतज़ार है धारा 144 लगने भर का और दूसरी तरफ़ लोगबाग बीसियों के झुण्ड में इकठ्ठे होकर जा रहें हैं 'गणपति बप्पा मोरिया' को सर्यू नदी में विसर्जन कराने.
दिल्ली के अख़बारों में पिछले दस दिनों से लगातार पढ़ने को मिल रहा था कि फैज़ाबाद -अयोध्या में बेहद कड़े सुरक्षा इंतज़ाम किया गए हैं. ताकि 24 सितम्बर को फ़ैसला आने के बाद किसी भी अनहोनी से निपटा जा सके.
पर ये क्या! फैज़ाबाद शहर में तो दाख़िल होने के क़रीब एक घंटे बाद ही पहला झुण्ड मिला कुछ पुलिस वालों का. दीन दुनिया से बेख़बर एक चाय के ढाबे पर बैठे गरम मसालेदार चाय की चुस्कियां ले रहे थे.
मज़े कि बात यही थी कि उनकी दायीं और बायीं ओर एक मौलाना और पार के साहबगंज इलाक़े के एक मंदिर के पुजारी भी विराजमान थे. और बातचीत का मुद्दा क्या हो सकता है. सुनकर मैं भी दंग ही रह गया. इन दिनों फैज़ाबाद-अयोध्या में मीडिया वाले कितने जमा हो गए हैं!
फैज़ाबाद से अयोध्या कि दूरी तो बहुत कम ही कही जाएगी मगर पहुँचने में समय ख़ासा लग जाता है. वजह संकरी सड़क और उस पर भी इन दिनों सड़कों पर यहाँ-वहां छोड़ दिए गए पुलिस के बैरिकेड. पर जो जगह फैज़ाबाद को अयोध्या से अलग करती है या यूँ कहें इन दोनों इलाकों के बीच कि लाइन ऑफ़ कंट्रोल है उसे 'टेढ़ी पुलिया कहते हैं.
इस पुलिया के ठीक बाएँ ओर जाती है एक रोड रामजन्मभूमि थाने की ओर. पतली सी इस सड़क का आगाज़ तो इस सीमा पर होता है लेकिन ख़ात्मा उसी विवादित जगह पर होता है जिसके फ़ैसले की घड़ी को साक्षात देखने और समझने हम दिल्ली से यहाँ तक आए हैं.
हैरानी की बात ये है कि इस थाने की सीमा जहाँ से शुरू होती है वो इलाक़ा मुस्लिम समुदाय के लोगों से भरा है और यहाँ ज़्यादातर आरा-मशीन यानी लकड़ी के कारख़ाने हैं.
पर इस थाने की आख़िरी सीमा जहाँ तक जाती है वहां आम तौर पर सैंकड़ों घर ऐसे हैं कि जिनमे अयोध्या के तमाम मंदिरों में पुजारी का काम कर रहे लोग बसते हैं.
बाकी तो सब ठीक है, लेकिन हैरत इस बात पर हुई कि आख़िर इस थाने का नाम रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद थाना क्यों नहीं है!












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