..तो हर दिन मनाना होगा ओजोन दिवस (ओजोन दिवस 16 सितम्बर पर विशेष)

नई दिल्ली, 15 सितम्बर (आईएएनएस)। किसी व्यवस्था में छेद होने से पहले हमारे विचारों में छुद्रता आती है और यह छुद्रता यदि वैचारिक हो तो इसका अर्थ यह है कि हमारे पतन की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। यह सलमान खान का कोई फिल्मी डायलाग नहीं है, सुलगती सच्चाई है और इस सच्चाई का सबब यह है कि आज राजनीति से लेकर समाज, अर्थव्यवस्था और हमारा पर्यावरण, सबकुछ छलनी हो चला है।

हमने ओजोन की उस छतरी में भी छेद कर डाला है, जो सूरज की खतरनाक किरणों से हमें अब तक बचाती रही है। चिंता की बात यह कि अब यह छेद सिर्फ छेद नहीं, मानव अस्तित्व के लिए अंतहीन सुरंग बनने की ओर बढ़ चला है।

हर वर्ष 16 सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस मनाया जाता है लेकिन यह समस्या सिर्फ एक दिन का समारोह मनाने से नहीं सुलझने वाली है। समाधान के लिए साल के 365 दिन हमें ओजोन दिवस मनाने होंगे।

नासा के औरा उपग्रह द्वारा प्राप्त आंकड़े के अनुसार ओजोन छिद्र का आकार 13 सितंबर, 2007 को अपने चरम पर पहुंच गया था, कोई 97 लाख वर्ग मील क्षेत्र के बराबर। यह क्षेत्रफल उत्तरी अमेरिका के क्षेत्रफल से भी बड़ा ठहरता है। 12 सितंबर, 2008 को छेद का आकार और बढ़ गया था।

वायुमंडल में मौजूद ओजोन की चादर लगातार झीनी हो रही है। सूरज से निकलने वाली खतरनाक पराबैंगनी किरणें हमारे अस्तित्व को छेद रही हैं। इस छतरी को छलनी बनाने के लिए कोई और नहीं, खुद हम, हमारी सोच और हमारी जीवनशैली जिम्मेदार है।

इस कारण आज हमें त्वचा कैंसर, त्वचा के बूढ़ा होने और आंखों की खतरनाक बीमारियों के खतरों से दो-चार होना पड़ रहा है। यदि समय रहते इस छेद को भरने की कारगर कोशिशें नहीं की गईं, तो ओजोन की छतरी का यह छेद हमारे जीवन में इतने छेद कर डालेगा कि उसे भर पाना कठिन हो जाएगा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ओजोन में छेद के लिए जिम्मेदार क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) के उत्पादन और इस्तेमाल पर आज से पूर्ण प्रतिबंध भी लगा दिया जाए, तो भी समस्या बनी रहेगी। क्योंकि वातावरण में मौजूद सीएफसी को समाप्त करने का कोई तरीका अभी तक नहीं ढूढ़ा जा सका है और यह गैस अगले 100 सालों तक वातावरण में बनी रहेगी।

अमेरिका, ओजोन क्षरण से सबसे पहले पीड़ित हुआ है, क्योंकि ओजोन की चादर में पहला छेद अंटार्कटिका के ठीक ऊपर बना है। इस छेद से न केवल इस महाद्वीप के लिए खतरा पैदा हुआ है, बल्कि कई अन्य महाद्वीपों के लिए भी, क्योंकि अंटार्कटिका की बर्फ पिघलने के कारण कई सारे देशों के जलमग्न होने का खतरा है।

अंटार्कटिका के ऊपर इस ओजोन छिद्र का पता 1985 में ब्रिटिश वैज्ञानिकों जोसेफ फारमैन, ब्रायन गार्डनर और ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के जोनाथन शंकलिन ने लगाया था।

ओजोन की चादर की खोज वर्ष 1913 में फ्रेंच वैज्ञानिकों, चार्ल्स फैब्री और हेनरी बूइसॉ ने की थी। पृथ्वी से 30 मील ऊपर तक का क्षेत्र वायुमंडल कहलाता है और ओजोन वायुमंडल के सबसे ऊपर हिस्से में स्थित होती है। ओजोन नीले रंग की गैस होती है। ओजोन में ऑक्सीजन के तीन परमाणु मिले हुए होते हैं।

सीएफसी से निकलने वाली क्लोरीन गैस ओजोन के तीन ऑक्सीजन परमाणुओं में से एक परमाणु से अभिक्रिया कर जाती है। यह प्रक्रिया जारी रहती है, और इस तरह क्लोरीन का एक परमाणु ओजोन के 100,000 अणुओं को नष्ट कर डालता है। इस खतरे के बावजूद सीएफसी गैस का आज हमारे जीवन में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। रेफ्रीजरेटर, एयर कंडीशनर जैसे आधुनिक उपकरण इसी गैस पर आश्रित है और हम इन उपकरणों पर।

वैसे मॉट्रियल प्रोटोकाल से जुड़े 30 देशों ने सीएफसी के इस्तेमाल में कमी लाने पर सहमति जताई है। यही नहीं वर्ष 2000 तक अमेरिका तथा यूरोप के 12 राष्ट्र सीएफएस के इस्तेमाल और उत्पादन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने पर सहमत हो गए थे। इसे एक बड़ी उपलब्धि मानी गई थी, क्योंकि ये देश दुनिया में उत्पादित होने वाले सीएफसी का तीन चौथाई हिस्सा पैदा करते हैं।

अमेरिका की एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (ईपीए) के अनुसार ओजोन क्षरण के कारण, वर्ष 2027 तक पैदा होने वाले छह करोड़ अमेरिकी त्वचा कैंसर से पीड़ित होंगे। इनमें से लगभग 10 लाख लोगों की मौत हो जाएगी। कुछ अनुसंधानों में कहा गया है कि कैंसर के अलावा मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाएगा।

ईपीए के अनुसार ओजोन क्षरण के कारण मोतियाबिंद के 1़ 70 करोड़ नए मामले सामने आ सकते हैं, वनस्पतियों का जीवन चक्र बदल सकता है, खाद्य श्रृंखला बिगड़ सकती है। इसका असर पशुओं पर भी पड़ेगा। इसके अलावा और क्या-क्या समस्याएं पैदा होंगी, कहना कठिन है।

समुद्र बुरी तरह प्रभावित होगा। अधिकांश सूक्ष्म जीवधारी समाप्त हो जाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो वे सभी जंतु भी मर जाएंगे जो खाद्य श्रृंखला में समुद्री सूक्ष्म जीवों पर निर्भर होते हैं।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर्राष्ट्रीय समिति (आईपीसीसी) की हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती का तापमान पिछले 100 सालों में 0़74 प्रतिशत बढ़ गया है। और इसका प्रभाव घातक है।

ओजोन की चादर को तार-तार होने से बचाने के लिए सीएफसी के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इसी बारे में जागरूकता फैलाने के लिए 16 सितंबर 1995 को संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहल पर मॉट्रियल प्रोटोकॉल को 191 देशों ने स्वीकृति दी थी। इसी स्वीकिृति की स्मृति में अब हर वर्ष 16 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस मनाया जाता है। लेकिन यह समस्या सिर्फ एक दिन का समारोह मनाने से नहीं सुलझने वाली है। समाधान के लिए साल के 365 दिन हमें ओजोन दिवस मनाने होंगे। और इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी सोच और जीवन शैली में बदलाव लाना होगा, कई सारे छोटे-बड़े उपाय अपनाने होंगे।

अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे, ऊर्जा की खपत घटानी होगी, पर्यावरण अनुकूल उत्पादों और वस्तुओं का इस्तेमाल करना होगा, स्थानीय स्तर पर जागरूकता फैलानी होगी। तो आइए हम सभी मिल कर इसके लिए अभी से संकल्प लें।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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