निर्माण श्रमिकों के कल्याण की उपेक्षा पर सर्वोच्च न्यायालय खफा
अदालत ने भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार एवं सेवा शर्त नियमन) अधिनियम-1996 तथा भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम-1996 के क्रियान्वयन में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की पूर्ण विफलता पर नाखुशी जाहिर की है।
भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम-1996 के तहत सभी राज्यों में निर्माण एजेंसी से निर्माण योजना का एक प्रतिशत उपकर के रूप में वसूलने के लिए एक कल्याण बोर्ड गठित किया जाना था।
इस धन का उपयोग भवन एवं निर्माण उद्योग से जुड़े श्रमिकों के स्वास्थ्य, चिकित्सा देखभाल, पेंशन, गृह ऋण और बच्चों की शिक्षा जैसी कल्याण योजनाओं में खर्च किया जाना था।
प्रधान न्यायाधीश एस.एच.कपाड़िया, न्यायमूर्ति के.एस.राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की खण्डपीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पूछा कि यदि राज्य सरकार तथा केंद्र शासित क्षेत्र श्रमिकों के कल्याण के लिए बने इस कानून को लागू नहीं कर रहे हैं, तो केंद्र सरकार क्या कर रही है।
अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र में 30 लाख निर्माण श्रमिक हैं और वहां कोई कल्याण बोर्ड गठित नहीं है।
अदालत ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा, "हमें नहीं पता कि केंद्र सरकार इस तरह के राज्यों को निर्देश क्यों जारी नहीं की है।"
अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों से, निर्माण श्रमिकों के कल्याण के लिए बने कानून को लागू करने और जनवरी 2010 में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पालन की दिशा में उठाए गए कदमों के बारे में आवश्यक विवरण मंगाए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












Click it and Unblock the Notifications