अमेरिका से रक्षा खरीद पर 3.8 प्रतिशत शुल्क देगा भारत

वाशिंगटन, 2 सितम्बर (आईएएनएस)। अमेरिका के विदेश सैन्य विक्रय (एफएमएस) कार्यक्रम के तहत भारत की सभी रक्षा खरीददारियों के लिए प्रशासकीय शुल्क 3.8 प्रतिशत तय किया गया है।

एफएमएस सौदों के तहत प्रशासकीय शुल्क सभी देशों के लिए समान है। अमेरिकी हथियार निर्माता कंपनियों से वार्ता, परीक्षण, सरकारी मंजूरियां सुनिश्चित करने और उपभोक्ताओं को सही आपूर्ति की गारंटी देने की प्रशासकीय सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए यह शुल्क अगस्त 2006 से लागू किया गया है।

रक्षा पत्रिका 'इंडिया स्ट्रेटजिक' के अगले अंक में अमेरिकी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इस शुल्क में कुछ भी ज्यादा या कम नहीं किया जा सकता।

एफएमएस योजना का संचालन अमेरिकी डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी (डीएससीए) द्वारा किया जाता है। अमेरिकी कानून के मुताबिक यह एजेंसी 'नो प्राफिट नो लॉस' की नीति के आधार पर काम करती है।

वर्ष 2007 से भारत ने अमेरिका से नौसेना के लिए आईएनएस जलअश्व (पूर्व यूएसएस ट्रेंटन) और वायु सेना के लिए छह सी-130 जे सुपर हरक्युलिस विमानों की खरीद की है। इसके अलावा बीईए सिस्टम्स के 145 होविट्जर विमानों और 17 सी17 ग्लोबमास्टर थ्री विमानों की खरीद के लिए वार्ता जारी है।

अमेरिका भारत को लाकहीड मार्टिन के सुपर वाइपर एफ-16 आईएन और बोइंग के एफ-18 सुपर हार्नेट लडाकू विमान बेचने का प्रयास कर रहा है। इसके अलावा उसकी कोशिश भारत को सीएच-47 एफ और अपाचे एंग्लो एएच 64 डी हेलीकॉप्टर बेचने की भी है।

भारतीय सेना ने रेथियन कंपनी की टैंक विध्वंसक मिसाइलें जेवलिन खरीदने का भी निर्णय लिया है। भारत से होने वाले इन सभी सौदों पर अमेरिका को सौदों की कुल कीमत का 3.8 प्रतिशत प्रशासकीय शुल्क के रूप में मिलेगा।

डीएससीए के पूर्व निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल जेफ्री कोहलर ने कहा कि एफएमएस योजना से अमेरिकी सरकार के अन्य देशों से सैन्य संबंध मजबूत हुए हैं। दूसरे देशों को भी इससे अमेरिकी प्रौद्योगिकी प्राप्त करना आसान हो गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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