'त्रुटिपूर्ण दायित्व कानून से भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को खतरा'
वाशिंगटन, 1 सितम्बर (आईएएनएस)। भारतीय संसद से पारित नागरिक परमाणु दायित्व विधेयक को त्रुटिपूर्ण बताते हुए अमेरिका के दक्षिण एशिया मामलों की एक विशेषज्ञ ने चेतावनी दी है कि इससे भारत और अमेरिका के बीच हुआ ऐतिहासिक परमाणु समझौता प्रभावित हो सकता है।
वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक हेरिटेज फाउंडेशन की दक्षिण एशिया मामलों की वरिष्ठ रिसर्च फेलो लीसा कर्टिस ने कहा कि भारतीय परमाणु उद्योग में अमेरिकी निवेश को बढ़ावा देने वाले अंतर्राष्ट्रीय प्रावधानों के अनुसार एक नागरिक परमाणु दायित्व व्यवस्था, द्विपक्षीय परमाणु समझौते को पूरा करने का अंतिम कदम होगी।
एक लेख में कर्टिस ने कहा कि अमेरिकी नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के नेताओं ने पारित विधेयक में परमाणु व्यापार के अंतर्राष्ट्रीय मानकों से असंगत भाषा के कायम रहने के बावजूद उस पर सुरक्षात्मक रुख अपनाया है।
विधेयक में संयंत्र के निर्माण के 80 वर्ष बाद तक किसी संभावित दुर्घटना के लिए उपकरणों, कच्चे माल और सेवा उपलब्ध कराने वाले आपूर्तिकर्ताओं को जवाबदेह बनाया गया है।
भारतीय उद्योग समूहों द्वारा कानून की आलोचना का उल्लेख करते हुए कर्टिस ने कहा, "भारत और अमेरिका के परमाणु समझौते के बीच यह नई बाधा दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि यह परमाणु ईंधन के पुनप्र्रसंस्करण पर इस वर्ष की शुरुआत में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद हुआ। इसमें भारत को परमाणु ईंधन के पुनप्र्रसंस्करण की सुविधा दी गई।"
उन्होंने कहा कि परमाणु दायित्व विधेयक के पारित होने के कुछ सप्ताह पहले ही अमेरिकी कांग्रेस ने एक ऐसे विधेयक को पारित किया जिसका सीधा निशाना कुशल पेशेवरों को अमेरिका लाने वाली भारतीय कंपनियां होंगी।
कर्टिस ने कहा कि राष्ट्रपति बराक ओबामा की नवंबर में तय भारत यात्रा के पहले इन मुद्दों को सुलझाने का एक मौका है लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को कदम आगे बढ़ाना होगा और आपसी हितों के समान आधार को खोजना होगा।
उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतंत्र में घरेलू मुद्दों का असर विदेश नीति पर होता है लेकिन अमेरिका और भारत को द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना जारी रखने के लिए इससे ऊपर उठना होगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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