आजादी के दीवाने की याद में मुंडन कराया
छतरपुर के रगौली गांव के निवासी परमार ने बुन्देलखण्ड में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चले आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। वह अग्रेजों द्वारा किए गए चरण पादुका हत्याकांड के भी गवाह थे। इस हत्याकांड को बुन्देलखण्ड का जलियांवाला बाग कहा जाता है। चरण पादुका में 14 जनवरी 1931 को स्वतंत्रता सेनानियों की बैठक चल रही थी तभी जनरल फिशर के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने हमला बोल दिया। इस मौके पर हुई गोलीबारी में कई लोग मारे गए थे।
परमार ने इस हत्याकांड के बाद जनरल फिशर को गोली मारी थी। परमार पर महोबा में ब्रिटिश सरकार का खजाना लूटने का आरोप भी लगा था। आजादी मिलने के बाद परमार ने कभी सरकारी सुविधाएं नहीं लीं, उन्होंने पेंशन लेने से भी इंकार कर दिया। परमार ने सात अगस्त को स्वास्थ्य खराब होने के चलते दुनिया छोड़ दी थी।
परमार की याद में उनके पैतृक ग्राम रगौली के अलावा परवाहा व हिनौता गांव के 100 से अधिक लोगों ने मुंडन कराया है। मुंडन कराने वालों में हर उम्र के लोग शामिल हैं। परमार के पिता और भाइयों ने भी आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। गांव के लोगों का कहना है कि परमार ने एक ओर सरकार से किसी तरह की सुविधा नहीं ली वहीं अपनी जमीन विद्यालय, अस्पताल व अन्य भवनों के लिए दान दी है। देशराज कहते है कि परमार उनके लिए आदर्श हैं और उनकी याद में गांव के हर वर्ग के लोगों ने मुंडन कराया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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