'नक्सलियों और पुलिस के बीच फंसे हैं जनजातीय लोग'
दिल्ली के एक मीडिया संस्थान में पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे कोडोप्पी को छत्तीसगढ़ पुलिस ने दंतेवाड़ा जिले के एक स्थानीय कांग्रेस नेता पर हमले का मुख्य आरोपी बताया था हालांकि बाद में उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी गई।
राज्य में जनजातीय समुदाय की समस्या और विकास के नाम पर जारी भ्रष्टाचार को उजागर के लिए संघर्ष कर रहे कोडोप्पी से आईएएनएस ने लंबी बातचीत की।
करीब 24 वर्षीय कोडोप्पी ने कहा कि उनकी तरह ही सैकड़ों जनजातीय लोग नक्सलियों और पुलिस के बीच चल रहे संघर्ष में फंस गए हैं। पुलिस की ओर से उन पर 'सलवा जुडूम' में शामिल होने का दबाव है और नक्सलियों की ओर से पुलिस के खिलाफ काम करने का।
स्वयं इस खींचतान का शिकार हो चुके कोडोप्पी ने बताया कि पुलिस उन पर सलवा जुडूम में शामिल होकर विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनने का दबाव बना रही थी और उधर नक्सली उन्हें अपने साथ काम करने के लिए धमका रहे थे।
नक्सलियों के खिलाफ राज्य सरकार स्थानीय युवकों को एसपीओ का दर्जा देकर मुकाबले में उनका सहयोग लेती है।
कोडोप्पी के मुताबिक एसपीओ बनने से इंकार करने के कारण उन्हें करीब 40 दिनों तक पुलिस की प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी।
पुलिस उत्पीड़न से बचने के लिए उन्हें अदालत का सहारा लेना पड़ा। कोडोप्पी का कहना है कि नक्सली बंदूक के बल पर जनजातियों की समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं लेकिन विचारधारा के स्तर पर वे इतने कट्टर हैं कि सत्ता उनके हाथों में चली जाए तो वे आवाज उठाने के जनता के लोकतांत्रिक अधिकार को खत्म कर देंगे।
कोडोप्पी के मुताबिक जनजातीय बहुल इलाकों में नक्सलियों के प्रभाव के विस्तार का मुख्य कारण पुलिस और प्रशासन की नाकामी है। इलाके में नक्सलियों के प्रभाव जमाने से पहले पुलिस और बाहरी लोग उनका शोषण करते थे। इन तत्वों की पुलिस और स्थानीय प्रशासन से भी सांठ-गांठ है और नक्सलियों से भी।
कोडोप्पी के मुताबिक ये तत्व इस क्षेत्र में बिचौलिए का काम करते हैं। वे अपनी सामाजिक हैसियत के बल पर सरकारी योजनाओं के ठेके लेते हैं और उसमें से एक निश्चित हिस्सा नक्सलियों और प्रशासन को देते हैं।
कोडोप्पी ने कहा कि जनजातीय इलाकों के संसाधनों पर बाहर से आकर बसे लोगों का कब्जा हो गया है। प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों से लेकर तमाम बड़े सरकारी पदों पर बाहरी लोगों का प्रभुत्व है।
ऐसे में जनजातीय समुदाय के युवकों के सामने सीमित विकल्प है और इसी कारण नक्सली इन युवकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होते हैं।
कोडोप्पी के मुताबिक नक्सलवाद को खत्म करने के लिए की जा रही कार्रवाई से इतर प्रभावित इलाकों के जनजातीय लोगों में आज विश्वास पैदा करने की जरूरत है। आज उन्हें उन्हीं की भाषा में सरकार और शासन का सही अर्थ बताने की जरूरत हैं। उनमें अहिंसक आंदोलन के माध्यम से समस्याओं के समाधान की ओर बढ़ने की संस्कृति विकसित करने की जरूरत है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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