न्यायालय ने शिक्षा नियामक को फटकार लगाई
एनसीटीई की यह आलोचना तब की गई जब इसके सदस्य सचिव हसिब अहमद ने अदालत से कहा कि नियामक ने निजी संस्थाओं को आगे किसी भी तरह की मान्यता देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है।
अदालत का कहना था, "विनियमन और निषेध के बीच एक अंतर है।"
न्यायाधीश जी.एस. सिंघवी और न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली ने कहा, "प्रतिबंध का मतलब है कि आपका विनियामक प्राधिकरण विफल रहा है। यह आप पर एक कमजोर टिप्पणी है। आपको अस्तित्व में नहीं होना चाहिए।"
अदालत ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में शिक्षा का नियमन करने वाली एजेंसियों का यदि यह हाल है तो ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सेवानिवृत्त नौकरशाहों से भरी हुई हैं, जिनके पास शिक्षा के प्रसार की कोई दृष्टि नहीं है।
अदालत ने अहमद से पूछा कि एनसीटीई में कितने सेवानिवृत्त नौकरशाह हैं।
अदालत ने कहा कि भारत को छोड़कर दुनियाभर में कहीं भी ऐसा नहीं है कि सेवानिवृत्त नौकरशाह शिक्षा के विनियमन के लिए गठित एजेंसियों की शोभा बढ़ा रहे हों।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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