तालिबान से सुलह की लक्ष्मण रेखा पर भारत को अमेरिका का समर्थन (राउंडअप)

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने अफगानिस्तान की सुरक्षा की जिम्मेदारी 2012 तक अफगानिस्तान सरकार को सौंपे जाने का समर्थन किया। लेकिन यहीं पर भारत और अमेरिका ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान समर्थित प्रस्तावित माफी सिर्फ उन्हीं तालिबान तत्वों के लिए होगी, जिनका अलकायदा और अन्य आतंकी संगठनों के साथ कोई संबंध नहीं होगा।

विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा ने अफगानिस्तान के भविष्य पर आयोजित काबुल सम्मेलन में अपने संबोधन में भारत और अफगानिस्तान को ऐतिहासिक मित्र करार दिया और इस बात पर जोर दिया कि अफगानिस्तान की स्थिरता के लिए किसी भी नई प्रक्रिया को पूरी तरह अफगान केंद्रित और अफगान का अपना होना चाहिए और उसे अफगानिस्तान की आबादी के हर वर्ग को साथ लेकर चलने लायक होना चाहिए तथा पारदर्शी व समग्र होना चाहिए।

पाकिस्तान का जिक्र किए बगैर कृष्णा ने आतंकवाद के साथ निपटने में दोहरा मानदंड अपनाने के खतरों के प्रति चेताया भी।

कृष्णा ने कहा, "अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि आतंकवाद के साथ निपटने में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। आतंकवाद को अलग-अलग नहीं बांटा जा सकता।"

कृष्णा ने आगे कहा, "जैसा कि राष्ट्रपति करजई ने आज कहा, हम एक सामूहिक शत्रु का सामना कर रहे हैं। आज कोई भी व्यक्ति अलकायदा और अन्य आतंकी संगठनों के बीच अंतर नहीं कर सकता।"

कृष्णा ने सीमा पार पाकिस्तान से अफगानी तालिबान को मिल रहे कथित समर्थन के एक स्पष्ट संदर्भ में कहा, "यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि अफगानिस्तान के बाहर से आतंकी संगठनों को मिल रहे समर्थन, मदद और संरक्षण को तत्काल समाप्त किया जाए।"

अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भारत के रुख का समर्थन किया। पाकिस्तान के एक परोक्ष संदर्भ में क्लिंटन ने कहा कि अफगानिस्तान के बाहर से आतंकी संगठनों को मिल रहे समर्थन, मदद और संरक्षण को तत्काल समाप्त किया जाए।

कृष्णा ने कहा, "भारत भी अफगानिस्तान के शांति व सुलह के प्रयासों का समर्थन करता है। लेकिन इस तरह के किसी प्रयास की सफलता के लिए उसे पूरी तरह अफगान केंद्रित और अफगान का अपना होना चाहिए और उसे अफगानिस्तान की आबादी के हर वर्ग को साथ लेकर चलने लायक होना चाहिए।"

कृष्णा ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाया कि इस प्रक्रिया में लंदन सम्मेलन में स्वीकृत लक्ष्मण रेखाओं का पालन किया जाना चाहिए। इनमें हिंसा त्यागना, आतंकवाद से सभी सूत्र काटना और अफगानिस्तान के लोकतांत्रिक व बहुलतावादी मूल्यों वाले संविधान को स्वीकार करना शामिल है।

सम्मेलन में 60 से अधिक देशों के विदेश मंत्री और प्रतिनिधि तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठन हिस्सा ले रहे हैं। अफगानिस्तान में 1970 के दशक के बाद अंतर्राष्ट्रीय नेताओं का यह सबसे बड़ा जमावड़ा है।

इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के रुख का समर्थन किया गया।

सम्मेलन में तैयार किए गए एक मसौदा विज्ञप्ति में कहा गया है, "अफगानिस्तान सरकार का शांति और सुलह कार्यक्रम सशस्त्र विपक्ष और उस समुदाय के सभी अफगान सदस्यों के लिए है, जिन्होंने हिंसा का त्याग कर दिए हों, उनका किसी भी अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठन से संबध न हो, संविधान का आदर करते हों और एक शांतिपूर्ण अफगानिस्तान का निर्माण चाहते हों।"

अफगानिस्तान ने भारत को खनन के लिए आमंत्रित किया :

अफगानिस्तान ने भारतीय कंपनियों को करीब 30 खरब डॉलर की अनुमानित कीमत वाले खनिज भंडारों के खनन का आमंत्रण दिया है। इस कदम से हिंसाग्रस्त देश के पुनर्निर्माण में भारत के हित बढ़ सकते हैं।

आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि अफगानिस्तान के खनिज मंत्री वहीदुल्लाह शहरानी ने सोमवार रात को भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा से मुलाकात की और खनिज संसाधनों के खनन के क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के प्रवेश का स्वागत किया।

अफगान मंत्री ने कृष्णा से कहा, "हम अच्छी साख वाली भारतीय कंपनियों का अफगानिस्तान के खनिज खनन क्षेत्र में स्वागत करते हैं।"

शहरानी ने कहा कि अफगान सरकार खनन उद्योग के लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाओं के विकास के क्षेत्र में खुली निविदाएं आमंत्रित कर रही है।

अफगानिस्तान के भविष्य पर एक दो दिवसीय सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए कृष्णा इस समय काबुल में हैं।

शहरानी ने पिछले महीने कहा था कि अफगानिस्तान में करीब 30 खरब डॉलर कीमत का खनिज हो सकता है। अमेरिका ने हाल ही में सार्वजनिक किया कि उसने लौह अयस्क, तांबा, कोबाल्ट और लिथियम के विशाल भंडारों का पता लगाया है। इनकी अनुमानित कीमत करीब 10 खरब डॉलर है।

विशेषज्ञों का मानन है कि भारी मात्रा में खनिजों की खोज से अफगान अर्थव्यवस्था में बदलाव आ सकता है और युद्ध से तबाह देश का पुनर्निर्माण तेज हो सकता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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