ग्रीन कार्ड मिलने का है इंजतार

ग्रीन कार्ड मिलने का है इंजतार

ज़ुबैर अहमद

बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन

नुरुद्दीन नुरू एक थके हारे इंसान लगते हैं. दाढ़ी बढ़ी हुई है, आँखें सूजी हैं और अधिकतर दांत गिर चुके हैं. वे अपनी 57 साल की आयु से कहीं ज्यादा के लगते हैं

उनकी आँखों की चमक और होंठों पर मुस्कान उस समय लौट आती है जब आप उनसे ग्रीन कार्ड के बारे में बात करते हैं.

वह कहते हैं, "मुझे उम्मीद है एक दिन मुझे ग्रीन कार्ड ज़रूर मिल जाएगा."

नुरुद्दीन नुरू बांग्लादेश के हैं. उनके जैसे बीस हज़ार से अधिक बांग्लादेशी अमरीका में ग़ैर क़ानूनी रूप से रह रहे हैं.

टूटते सपने

दक्षिण एशियाई देशों के ऐसे लोगों की संख्या एक लाख से अधिक है. एक अनुमान के मुताबिक़ एक करोड़ 20 लाख लोग अवैध रूप से अमरीका में सालों से रह रहे हैं.

अब उन्हें ग्रीन कार्ड मिलने की उम्मीद है. इसके बाद वे क़ानूनी रूप से यहाँ रह सकते हैं और काम कर सकते हैं .

राष्ट्रपति बराक ओबामा उनके हीरो हैं. क्योंकि वे इस सिलसिले में एक विधेयक कांग्रेस से पास कराने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन आम अमरीकी इसके खिलाफ नज़र आते हैं.

रिपब्लिकन पार्टी इसका कड़ा विरोध कर रही है. यह मुद्दा इन दिनों यहाँ चर्चा में है.

नुरुद्दीन नुरू यहाँ 15 साल पहले बांग्लादेश से अमीर बनने का सपना लेकर आए थे. वे अमीर तो नहीं बन पाए लेकिन परिवार उनसे ज़रूर दूर हो गया.

अपनी पत्नी की मौत की कहानी नम आँखों से बयान करते हुए नुरू कहते हैं,"एक साल पहले मेरी पत्नी गुज़र गई... मेरा इंतज़ार करके. उसने अपनी बेटियों से मरने के एक सप्ताह पहले से कहना शुरू कर दिया था कि उसे दुख इस बात का है कि वह कभी उनके पिता से नहीं मिल पाएगी."

इस बीच उनके दोनों बेटों-बेटियों की शादी हो गई. वे इन ख़ुशियों में शामिल नहीं हो सके.

क्या उनका अमरीका आने का फ़ैसला ग़लत था? इस सवाल पर नुरू कहते हैं, ''नहीं. मैं अब भी अपने परिवार का खर्च अकेले उठाता हूँ. मुझे इस बात की संतुष्टि है की मेरे परिवार को कोई तकलीफ नहीं है"

नुरू के दोस्त रेहानुद्दीन रेनू भी अमीर बनने का सपना लेकर 20 साल पहले अमरीका आए थे. उनके भी बेटे-बेटियों की उनकी ग़ैर हाजरी में शादियाँ हो गईं. वे कहते हैं, "मुझे इसका बहुत दुख होता है."

घरवालों की याद

क्या उन्हें अपनी पत्नी और बच्चों की याद नहीं आती? इस सवाल पर रेनू कहते हैं, "उनकी तस्वीरें देखता हूँ और रोता रहता हूँ"

तो फिर ये लोग वापस क्यों नहीं चले जाते हैं? शायद गिरफ़्तार होने के डर से. लेकिन उनका कहना कुछ और था.

रेनू कहते हैं, "इतने साल यहाँ रह कर हम यहाँ के ही होकर रह गए हैं. यहाँ हमें अच्छा भी लगता है.हम यहाँ के नागरिक की तरह महसूस करते हैं."

वे अमरीका का हिस्सा बन कर उसकी प्रगति में शामिल होना चाहते हैं.

नुरुद्दीन नुरू कहते हैं कि अगर उन्हें ग्रीन कार्ड मिल गया तो वे टैक्स भी देना शुरू कर देंगे जिससे सरकार का ही फ़ायदा होगा.

लेकिन रेनू, जो दो साल कनाडा में भटकने के बाद बड़ी मुश्किल से रिश्वत देकर अमरीका पहुँचे थे कहते हैं,"अगर इस साल यह क़ानून पास नहीं हुआ तो वे अपने देश वापस चले जाएँगे."

लेकिन शायद यह अधिकतर लोगों के लिए आसान न हो.

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